भूमिका: योग मेरे लिए क्या है?
मेरे अध्ययन और व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, योग केवल शरीर को मोड़ने या कुछ आसन करने की प्रक्रिया नहीं है। योग मेरे लिए जीवन को संतुलित करने की एक आंतरिक तकनीक (योगसूत्र) है। जब मैंने योग को केवल फिटनेस या व्यायाम से अलग करके, एक चेतना-विज्ञान के रूप में देखना शुरू किया, तब मुझे इसका वास्तविक अर्थ समझ में आया। आज के समय में, जब जीवन अत्यधिक तेज़, प्रतिस्पर्धी और मानसिक रूप से थकाने वाला हो गया है, योग मेरे लिए स्वयं से जुड़ने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम बन गया है।
मैंने अपने अनुभव में यह भी महसूस किया है कि योग कोई एक बार किया जाने वाला अभ्यास नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे जीवन का स्वभाव बन जाता है। जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता है, वैसे-वैसे व्यक्ति की प्रतिक्रियाएँ, निर्णय और दृष्टिकोण भी बदलने लगते हैं। योग मुझे हर दिन यह याद दिलाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, भीतर संतुलन संभव है।
योग शब्द संस्कृत की ‘युज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना या एकीकृत करना। पतंजलि योगसूत्र के अनुसार योग का उद्देश्य शरीर, प्राण, मन और चेतना को एक सूत्र में बाँधना है। मेरे अनुभव में, जब यह एकीकरण होने लगता है, तभी व्यक्ति वास्तव में शांत और स्थिर महसूस करता है।
योगसूत्र के अनुसार योग की परिभाषा
मेरे अध्ययन का मुख्य आधार पतंजलि योगसूत्र रहा है। योगसूत्र में योग की सबसे प्रसिद्ध परिभाषा दी गई है:
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (योगसूत्र 1.2)
मेरे अनुसार, इस सूत्र का अर्थ केवल मन को रोकना नहीं है, बल्कि मन की अनावश्यक उथल-पुथल से मुक्त होना है। आज के समय में हमारा चित्त लगातार सूचनाओं, डर, भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे में उलझा रहता है। योग वही प्रक्रिया है जो इस बिखराव को धीरे-धीरे शांत करती है।पतंजलि योगसूत्र की मूल व्याख्या के लिए मैंने SwamiJ.com जैसे प्रामाणिक स्रोतों का अध्ययन किया है… https://www.swamij.com/yoga-sutras.htm
योगसूत्र आगे कहता है:
“तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” (योगसूत्र 1.3)
मेरे अनुभव में, जब मन शांत होता है, तब व्यक्ति स्वयं को स्पष्ट रूप से देखने लगता है। यह आत्मनिरीक्षण ही योग का वास्तविक फल है।
अष्टांग योग: योग का पूर्ण ढांचा
मेरे अध्ययन के अनुसार, अष्टांग योग को केवल आठ चरणों की सूची की तरह देखना इसकी गहराई को कम कर देता है। वास्तव में यह मानव चेतना के क्रमिक विकास की एक वैज्ञानिक संरचना है। पतंजलि ने अष्टांग योग को इस तरह व्यवस्थित किया है कि साधक पहले बाहरी जीवन में संतुलन लाए, फिर धीरे-धीरे भीतर की यात्रा आरंभ करे। मेरे अनुभव में, यदि इन चरणों को उलट दिया जाए या अधीरता दिखाई जाए, तो योग का प्रभाव सतही ही रह जाता है।
पतंजलि ने योग को एक क्रमबद्ध पथ के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसे अष्टांग योग कहा जाता है। मेरे अनुसार, अष्टांग योग केवल साधकों के लिए नहीं, बल्कि हर आधुनिक मनुष्य के लिए एक जीवन-मार्गदर्शक है।
यम और नियम: आंतरिक अनुशासन की नींव
मेरे अध्ययन और जीवन अनुभव के अनुसार, योग की शुरुआत शरीर से नहीं, बल्कि आचरण से होती है। यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत प्रासंगिक हैं। मैंने यह महसूस किया है कि जब व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार में संतुलन लाता है, तभी योगासन और ध्यान वास्तव में प्रभावी होते हैं।
आसन: शरीर को साधन बनाना
मेरे लिए आसन का उद्देश्य कभी भी केवल लचीलापन या शक्ति बढ़ाना नहीं रहा। नियमित अभ्यास के दौरान मैंने यह अनुभव किया है कि शरीर में जमी हुई जकड़न वास्तव में मन में जमी हुई भावनाओं से जुड़ी होती है। जब किसी दिन मन अशांत होता है, उसी दिन शरीर भी भारी और कठोर महसूस होता है। आसन उस कठोरता को धीरे-धीरे खोलते हैं और शरीर को साधना का माध्यम बनाते हैं।
आसन मेरे लिए शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम हैं, न कि लक्ष्य। नियमित अभ्यास से मैंने यह अनुभव किया है कि जब शरीर स्थिर और सहज होता है, तब मन भी स्वतः शांत होने लगता है। योगसूत्र में कहा गया है:
“स्थिरसुखमासनम्” (योगसूत्र 2.46)
इसका अर्थ मेरे अनुसार यह है कि आसन वह है जिसमें स्थिरता भी हो और सहजता भी।
प्राणायाम और श्वास का महत्व
मेरे अनुभव में, यदि योग का कोई एक ऐसा अंग है जो सीधे जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, तो वह श्वास है। मैंने स्वयं यह महसूस किया है कि तनाव, क्रोध या भय की अवस्था में मेरी सांस स्वतः उथली और तेज़ हो जाती है। जैसे ही मैं श्वास को गहरा और लयबद्ध करता हूँ, मन स्वतः शांत होने लगता है। प्राणायाम वास्तव में श्वास और चेतना के बीच सेतु का कार्य करता है।
योगसूत्र कहता है:
“तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः” (योगसूत्र 2.49)
मेरे लिए प्राणायाम केवल तकनीक नहीं, बल्कि मन को वर्तमान में लाने का सरल साधन है। मैं प्रतिदिन सुबह लगभग 10 मिनट ध्यान और श्वास पर केंद्रित अभ्यास करता हूँ। इस छोटे से अभ्यास ने मेरी निर्णय क्षमता, धैर्य और मानसिक स्पष्टता को गहराई से प्रभावित किया है।
प्रत्याहार, धारणा और ध्यान: भीतर की यात्रा
मेरे अनुभव के अनुसार, आधुनिक जीवन में सबसे बड़ी चुनौती है — इंद्रियों का बाहरी आकर्षण। हम लगातार सूचनाओं, दृश्यों और अपेक्षाओं से घिरे रहते हैं। प्रत्याहार मुझे यह सिखाता है कि हर उत्तेजना पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है। यह अभ्यास धीरे-धीरे इंद्रियों को विश्राम देना सिखाता है।
धारणा और ध्यान का अभ्यास मैंने धीरे-धीरे विकसित किया है। शुरुआत में मन बार-बार भटकता था, लेकिन समय के साथ मैंने यह समझा कि ध्यान मन को रोकने का प्रयास नहीं, बल्कि उसे देखने की कला है। जब मैं प्रतिदिन सुबह लगभग 10 मिनट ध्यान में बैठता हूँ, तो वह समय मेरे लिए किसी लक्ष्य को पाने का नहीं, बल्कि स्वयं को समझने का अवसर बन जाता है।
“तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्” (योगसूत्र 3.2)
मेरे लिए ध्यान का अर्थ है — स्वयं के साथ ईमानदार होना, बिना किसी आडंबर के।
समाधि: अनुभव, लक्ष्य नहीं
मेरे अध्ययन और अनुभव के अनुसार, समाधि को अक्सर एक रहस्यमय या अलौकिक अवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि योगसूत्र इसे अत्यंत स्वाभाविक स्थिति मानता है। समाधि कोई ऐसी अवस्था नहीं है जिसे जबरन प्राप्त किया जाए। यह तो तब घटती है जब अभ्यास निरंतर हो और अहंकार धीरे-धीरे शिथिल पड़ने लगे।
मेरे अनुभव में, समाधि के छोटे-छोटे क्षण दैनिक जीवन में भी आते हैं — जब मन पूर्णतः शांत हो, निर्णय स्पष्ट हों और भीतर किसी प्रकार का द्वंद्व न हो। यही योग का वास्तविक फल है।
शरीर और मन का संतुलन: योग का व्यावहारिक पक्ष
मेरे अनुभव में, योग ने मुझे यह गहराई से समझाया कि शरीर और मन अलग-अलग इकाइयाँ नहीं हैं। लंबे समय तक बैठकर काम करना, अनियमित दिनचर्या और मानसिक दबाव शरीर में थकान और रोग का रूप ले लेते हैं। जब मैंने योग को नियमित किया, तब धीरे-धीरे यह अनुभव हुआ कि शरीर हल्का और मन अधिक स्पष्ट होने लगा है।

योग का सबसे व्यावहारिक पक्ष यही है कि यह हमें अपने शरीर के संकेतों को सुनना सिखाता है। जब हम इन संकेतों को समझने लगते हैं, तभी वास्तविक संतुलन संभव होता है।
आज के समय में योग क्यों प्रासंगिक है?
मेरे अनुसार, आज योग की प्रासंगिकता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि आधुनिक जीवन ने हमें निरंतर प्रतिक्रिया की अवस्था में डाल दिया है। मोबाइल नोटिफिकेशन, कार्य का दबाव और भविष्य की असुरक्षा मन को कभी विश्राम नहीं लेने देती। योग मुझे यह सिखाता है कि प्रतिक्रिया से पहले ठहरना भी एक शक्ति है। यह ठहराव ही आज के समय में सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। आधुनिक जीवनशैली में योग के व्यावहारिक प्रयोगों पर Yoga Journal जैसे वैश्विक मंच भी लगातार प्रकाश डालते हैं… https://www.yogajournal.com
मेरे अनुसार, आधुनिक जीवन ने हमें तेज़ बना दिया है, लेकिन गहरा नहीं। योग हमें धीमा करना सिखाता है, ताकि हम सचेत हो सकें। आज की बीमारियाँ — तनाव, अवसाद, अनिद्रा — मूलतः जीवनशैली से जुड़ी हैं। योग इनका समाधान बाहर नहीं, भीतर खोजने की शिक्षा देता है।
मेरा व्यक्तिगत अनुभव और निष्कर्ष
मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, योग ने मुझे स्वयं के साथ अधिक ईमानदार बनाया है। पहले जहाँ मैं परिणामों और उपलब्धियों पर अधिक ध्यान देता था, वहीं अब प्रक्रिया में रहने का अभ्यास सीख रहा हूँ। प्रतिदिन सुबह का छोटा सा ध्यान और श्वास अभ्यास मेरे लिए किसी कठोर अनुशासन से अधिक एक संवाद बन गया है — स्वयं से संवाद।
योग ने मुझे यह समझाया कि संतुलन कोई स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रतिदिन साधा जाने वाला अभ्यास है। आज के समय में, जब बाहरी दुनिया हमें लगातार अस्थिर करने का प्रयास करती है, योग भीतर स्थिर रहने की क्षमता प्रदान करता है। मेरे लिए योग जीवन को बेहतर बनाने की नहीं, बल्कि उसे समझने की प्रक्रिया है।
अंततः, योग मेरे लिए स्वयं से जुड़ने का माध्यम है — बिना किसी दिखावे के, बिना किसी दबाव के। यही कारण है कि मेरे अनुसार, आज के समय में योग केवल प्रासंगिक नहीं, बल्कि आवश्यक हो गया है।
लेखक: Deepak Kumar Mishra, Founder & Editor – TheSwadeshScoop.com
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