आधुनिक जीवन में सनातन धर्म: कालातीत ज्ञान की प्रासंगिकता
परिचय (Introduction) तीव्र गति से बदलते, तकनीकी रूप से उन्नत आधुनिक युग में, जहाँ क्षणभंगुर प्रवृत्तियाँ हावी हैं और भौतिकवाद की दौड़ हर दिन तेज हो रही है, “सनातन धर्म” की अवधारणा एक शाश्वत और स्थिर प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़ी है। यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत तरीका, एक सार्वभौमिक नैतिक संहिता और अस्तित्व के गहरे सत्यों को समझने का एक दार्शनिक ढाँचा है। ‘सनातन’ शब्द का अर्थ है ‘शाश्वत’ या ‘जो हमेशा से है’, और ‘धर्म’ का अर्थ है ‘धारण करने वाला’, ‘कर्तव्य’, ‘नैतिकता’, या ‘जीवन का नियम’। इस प्रकार, सनातन धर्म का शाब्दिक अर्थ है ‘शाश्वत नियम’ या ‘जीवन का शाश्वत मार्ग’। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं किया गया है, बल्कि यह ऋषियों, मुनियों और आत्मज्ञानी द्रष्टाओं द्वारा सहस्राब्दियों के आध्यात्मिक अनुभव और गहन चिंतन का परिणाम है। आज, जब मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ रही हैं, सामाजिक ताने-बाने में तनाव दिख रहा है, और व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर भ्रमित हैं, तो आधुनिक जीवन में सनातन धर्म के सिद्धांत अद्वितीय प्रासंगिकता प्रस्तुत करते हैं। यह हमें न केवल व्यक्तिगत शांति और सद्भाव प्राप्त करने में मदद करता है, बल्कि एक अधिक न्यायपूर्ण, नैतिक और टिकाऊ समाज के निर्माण के लिए भी एक मार्ग प्रदान करता है। यह लेख आधुनिक जीवन की चुनौतियों के संदर्भ में सनातन धर्म के महत्व, ऐतिहासिक संदर्भ और उसकी गहन प्रासंगिकता का अन्वेषण करेगा, जिसमें प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों और व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। विस्तार (Explanation) आधुनिक जीवन में सनातन धर्म की विशालता और गहराई को कुछ ही शब्दों में समेटना कठिन है, लेकिन इसके कुछ केंद्रीय सिद्धांत हैं जो आधुनिक जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 1. धर्म: नैतिक और धार्मिक कर्तव्य का मार्ग सनातन धर्म में ‘धर्म’ केंद्रीय अवधारणा है। यह केवल ‘धर्म’ के अंग्रेजी अर्थ से कहीं अधिक व्यापक है। धर्म का अर्थ है वह जो धारण करता है, जो व्यवस्था बनाए रखता है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवस्था, ब्रह्मांडीय संतुलन और नैतिक आचरण का प्रतीक है। महाभारत में कहा गया है: “धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥” (वनपर्व, 213.116) – अर्थात्, “जो धारण करता है, वही धर्म है; धर्म ही प्रजा को धारण करता है। जिसमें धारण करने की शक्ति है, वही धर्म है, यह निश्चित है।” आधुनिक जीवन में, जहाँ अनैतिकता और अवसरवादिता अक्सर पनपती है, धर्म का सिद्धांत व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों, नैतिक मूल्यों और सही आचरण का पालन करने के लिए प्रेरित करता है, भले ही तत्काल परिणाम प्रतिकूल लगें। यह हमें सिखाता है कि सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, दान और आत्म-नियंत्रण केवल धार्मिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि एक सुखी और सार्थक जीवन के लिए आवश्यक आधारशिलाएँ हैं। उदाहरण के लिए, व्यावसायिक नैतिकता (business ethics), पर्यावरणीय जिम्मेदारी (environmental responsibility) और सामाजिक न्याय (social justice) की अवधारणाएँ सीधे धर्म के सिद्धांतों से निकली हैं। एक सच्चा व्यापारी धर्म का पालन करेगा, अपने ग्राहकों को धोखा नहीं देगा और अपने कर्मचारियों का शोषण नहीं करेगा। 2. कर्म: क्रिया और परिणाम का सार्वभौमिक नियम कर्म का नियम आधुनिक जीवन में सनातन धर्म का एक और मौलिक सिद्धांत है। यह बताता है कि प्रत्येक क्रिया का एक समान और विपरीत परिणाम होता है, और यह परिणाम अंततः कर्ता को ही भोगना पड़ता है। “यथा बीजं विना क्षेत्रं नोप्तं फलति कर्हिचित्। तथा कर्म विना देही न तिष्ठति कदाचन॥” (गरुड़ पुराण) – “जैसे बिना खेत के बीज फल नहीं देता, वैसे ही कर्म के बिना कोई भी प्राणी क्षण भर भी नहीं रहता।” भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” (भगवद गीता 2.47) – “कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मों के फल की इच्छा वाले मत बनो और न ही तुम्हारी कर्म न करने में आसक्ति हो।” https://www.bhagavad-gita.us/bhagavad-gita-2-67/ आधुनिक युग में, जहाँ त्वरित लाभ और शॉर्टकट की तलाश आम है, कर्म का सिद्धांत हमें दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारे निर्णय और कार्य, चाहे वे कितने भी छोटे क्यों न हों, हमारे भविष्य और दूसरों के भविष्य को प्रभावित करते हैं। यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ावा देता है और हमें आत्म-निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है। साइबरबुलिंग, कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य अंततः नकारात्मक कर्म उत्पन्न करते हैं, जो व्यक्ति और समाज दोनों को प्रभावित करते हैं। कर्म का सिद्धांत हमें अपनी चेतना में कार्य करने और दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने की…
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