देव उठानी एकादशी: श्री विष्णु-तुलसी विवाह की दिव्य कथा और महत्व

दिनांक: 01 नवंबर, 2025 (शनिवार) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देव उठानी एकादशी या देवोत्थान एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शुभ तिथि है। यह वह पावन दिन है जब जगत के पालनहार भगवान विष्णु अपनी चार मास की योगनिद्रा (चातुर्मास) से जागृत होते हैं और इसी के साथ सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों का शुभारंभ हो जाता है। इस एकादशी का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है – तुलसी विवाह, जिसमें भगवान विष्णु के शालीग्राम स्वरूप का विवाह माता तुलसी से कराया जाता है। यह पर्व आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टियों से अति विशिष्ट है। https://vadicjagat.co.in/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95-49/ देव उठानी एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, इस वर्ष देव उठानी एकादशी 1 नवंबर 2025 (शनिवार) को मनाई जाएगी। विवरण तिथि और समय एकादशी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर 2025, सुबह 09 बजकर 12 मिनट से एकादशी तिथि का समापन 2 नवंबर 2025, सुबह 07 बजकर 32 मिनट तक देव उठानी एकादशी व्रत 1 नवंबर 2025 (शनिवार) तुलसी विवाह (द्वादशी तिथि) 2 नवंबर 2025 (रविवार) मान्यतानुसार, जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं, तभी से सृष्टि में सकारात्मकता और शुभता का संचार होता है। इसलिए इस दिन को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, जिसमें बिना पंचांग देखे भी विवाह जैसे शुभ कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। भगवान विष्णु-तुलसी विवाह की पौराणिक कथा देव उठानी एकादशी के पावन अवसर पर होने वाले तुलसी विवाह के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है, जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण और शिव महापुराण में मिलता है। कथा का सार और संदर्भ: प्राचीन काल में, वृंदा नामक एक परम सुंदरी, पवित्र और पतिव्रता स्त्री थी। उसका विवाह जालंधर नामक अत्यंत बलशाली और क्रूर असुर से हुआ था, जो सागर से उत्पन्न हुआ था। वृंदा के प्रबल सतीत्व के कारण, जालंधर को कोई भी देव या दैत्य पराजित नहीं कर सकता था। उसके अत्याचार से त्रस्त होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जालंधर के विनाश का उपाय पूछा। देवताओं की प्रार्थना सुनकर, भगवान विष्णु ने जालंधर के पतिव्रत धर्म को भंग करने का निर्णय लिया। भगवान विष्णु ने छल से जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के महल में प्रवेश किया। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्पर्श किया, जिससे उनका सतीत्व खंडित हो गया। इसी क्षण युद्ध भूमि में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया, क्योंकि अब उसकी शक्ति समाप्त हो चुकी थी। जब वृंदा को यह सत्य ज्ञात हुआ कि उसके साथ छल किया गया है और यह उनके पति नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु थे, तो वह अत्यंत क्रोधित हुई। अपने सतीत्व के भंग होने और पति की मृत्यु से दुखी वृंदा ने भगवान विष्णु को ‘पत्थर’ (शालिग्राम) बन जाने का शाप दे दिया। वृंदा के शाप के प्रभाव से भगवान विष्णु तुरंत पत्थर बन गए। यह देखकर सभी देवताओं में हाहाकार मच गया। माता लक्ष्मी सहित सभी देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की कि वह अपना शाप वापस ले लें। वृंदा ने पश्चाताप करते हुए भगवान विष्णु को शाप से मुक्त तो कर दिया, लेकिन स्वयं को पति की चिता में भस्म कर लिया और सती हो गईं। भगवान विष्णु का वरदान: जिस स्थान पर वृंदा भस्म हुईं, वहाँ एक पवित्र पौधा उत्पन्न हुआ, जिसे देवताओं ने ‘तुलसी’ नाम दिया। तब भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा, “हे वृंदा! तुमने अपने सतीत्व के बल पर मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय कर लिया है। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। बिना तुलसी दल के मेरा कोई भी भोग पूर्ण नहीं होगा। तुम्हारा विवाह मेरे शालीग्राम स्वरूप से होगा और जो भी भक्त कार्तिक मास की एकादशी पर तुम्हारा विवाह शालीग्राम से कराएगा, वह समस्त सुखों को प्राप्त करेगा।” तभी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह माता तुलसी से कराने की परंपरा चली आ रही है। देव उठानी एकादशी का दार्शनिक संदेश (Philosophical Message) यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन के गहरे दार्शनिक सत्यों का प्रतीक है: देव उठानी एकादशी कैसे मनाएं और क्या करें? इस दिन विशेष रूप से व्रत, पूजा और तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। 1. व्रत और संकल्प 2. भगवान विष्णु का उत्थापन (जगाने का अनुष्ठान) 3. तुलसी विवाह का अनुष्ठान (द्वादशी को) इस दिन क्या करें और क्या न करें? (Rituals and Guidelines) क्या करें (Do’s) क्या न करें (Don’ts) तुलसी की पूजा: सुबह-शाम तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएं और परिक्रमा करें। चावल का सेवन: एकादशी तिथि पर चावल या चावल से बने पदार्थों का सेवन न करें। दान-पुण्य: अन्न,…

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पुनर्जन्म का रहस्य: 5 अविश्वसनीय सबूत और दुनिया की 3 सबसे बड़ी कहानियों का खुलासा!

पुनर्जन्म का रहस्य: पुनर्जन्म (Punrajanm) या कायांतरण (Reincarnation) मानव इतिहास के सबसे गहरे और सबसे विवादास्पद रहस्यों में से एक है। यह केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक ऐसा दार्शनिक विचार है जिसने सदियों से वैज्ञानिकों, विचारकों और आम लोगों को समान रूप से आकर्षित किया है। क्या वास्तव में आत्मा एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, जैसे हम पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए धारण करते हैं? यह लेख पुनर्जन्म का रहस्य, इसके वैज्ञानिक साक्ष्य, धार्मिक मान्यताएँ और दुनिया भर से एकत्रित की गई असाधारण कहानियों का खुलासा करता है। मनुष्य हमेशा से मृत्यु के बाद के जीवन को समझने की कोशिश करता रहा है। यदि जीवन एक पाठशाला है, तो पुनर्जन्म का रहस्य इस बात की व्याख्या करता है कि आत्मा, अपने कर्मों और अधूरे अनुभवों को पूरा करने के लिए, बार-बार इस पाठशाला में क्यों लौटती है। यह लेख उस अटूट चक्र की पड़ताल करता है जिसे ‘कर्म’ और ‘पुनर्जन्म’ के नाम से जाना जाता है। 1. पुनर्जन्म: धार्मिक और दार्शनिक आधार दुनिया के अधिकांश प्राचीन और प्रमुख धर्म किसी न किसी रूप में इस विचार को मानते हैं कि ऊर्जा या आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। A. हिन्दू धर्म और भगवद गीता हिन्दू धर्म में, पुनर्जन्म का रहस्य कर्म के सिद्धांत पर आधारित है। आत्मा को अजर-अमर माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में इस सिद्धांत को सबसे स्पष्ट रूप से समझाया है: उद्धरण: “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥” अर्थ: “जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्रों को धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा जीर्ण-शीर्ण शरीर को त्यागकर नए शरीर को प्राप्त करती है।” (भगवद गीता, अध्याय 2, श्लोक 22) यह श्लोक पुनर्जन्म को एक प्राकृतिक और निरंतर प्रक्रिया के रूप में स्थापित करता है। आत्मा का जन्म-मृत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक वह मोक्ष (Moksha) प्राप्त नहीं कर लेती। B. बौद्ध धर्म और अनात्मन (Anatman) बौद्ध धर्म भी पुनर्जन्म (जिसे अक्सर पुनर्जन्म की प्रक्रिया कहा जाता है) को मानता है, लेकिन यह हिन्दू दर्शन से थोड़ा अलग है। उद्धरण (बुद्ध): “इंसान की इच्छाओं का पुनर्जन्म होता है।” (Quoted by Quora) C. पश्चिमी दार्शनिकों के विचार पुनर्जन्म सिर्फ पूर्वी अवधारणा नहीं है। कई पश्चिमी दार्शनिक भी इस पर विश्वास करते थे: 2. पुनर्जन्म का वैज्ञानिक शोध: डॉ. इयान स्टीवेन्सन का कार्य पुनर्जन्म का रहस्य पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक जाँच का विषय बन गया है।https://www.azquotes.com/quotes/topics/reincarnation.html#:~:text=I%20could%20well%20imagine%20that,8%20Copy इस क्षेत्र में सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली कार्य अमेरिकी मनोचिकित्सक डॉ. इयान स्टीवेन्सन (Dr. Ian Stevenson) का है। A. वर्जीनिया विश्वविद्यालय में शोध डॉ. स्टीवेन्सन ने अपने जीवन के 40 से अधिक वर्ष ऐसे बच्चों के मामलों की जाँच में बिताए जो पिछले जीवन की यादें होने का दावा करते थे। B. जन्मचिह्न और शारीरिक निशान (Birthmarks and Birth Defects) डॉ. स्टीवेन्सन के शोध का सबसे विवादास्पद और अद्वितीय पहलू वह सहसंबंध था जो उन्होंने जन्मचिह्नों और पिछले जन्म की चोटों के बीच पाया। स्टीवेन्सन के काम ने पुनर्जन्म को केवल एक धार्मिक अवधारणा के बजाय एक “टेनेबल हाइपोथीसिस” (Tenable Hypothesis) बना दिया, जिसे वैज्ञानिक रूप से खारिज करना मुश्किल है। 3. दुनिया भर से पुनर्जन्म की असाधारण कहानियाँ पुनर्जन्म का रहस्य को समझने के लिए, हमें उन असाधारण कहानियों पर गौर करना होगा जिन्हें डॉ. स्टीवेन्सन और अन्य शोधकर्ताओं ने प्रलेखित (Documented) किया है। A. भारत से – शांति देवी की कहानी (Shanti Devi, India) यह कहानी पुनर्जन्म का रहस्य पर दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध और सबसे विश्वसनीय मामलों में से एक है, जिस पर महात्मा गांधी द्वारा गठित एक समिति ने भी जाँच की थी। B. इंग्लैंड से – पोलॉक जुड़वाँ (Pollock Twins, England) यह मामला डॉ. इयान स्टीवेन्सन के शुरुआती महत्वपूर्ण मामलों में से एक था। C. थाईलैंड से – बच्चा जो पूर्व जन्म के शरीर के निशान याद रखता है डॉ. स्टीवेन्सन ने थाईलैंड में एक लड़के का अध्ययन किया, जिसने एक शिक्षक के रूप में अपने पिछले जीवन को याद किया था, जिसकी मृत्यु सिर में गोली लगने से हुई थी। 4. पुनर्जन्म और कर्म का अटूट संबंध पुनर्जन्म का रहस्य को समझने के लिए कर्म के सिद्धांत को समझना अनिवार्य है। कर्म एक ‘कॉस्मिक लॉ’ है, जिसका अर्थ है क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम। 5. आधुनिक विज्ञान की चुनौती और भविष्य की दिशा कई आलोचक, जिनमें मनोवैज्ञानिक (Psychologists) और भौतिकवादी (Materialists) शामिल हैं, पुनर्जन्म के दावों को खारिज करते हैं। उनके मुख्य तर्क हैं: हालांकि, डॉ. इयान स्टीवेन्सन के…

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आधुनिक जीवन में सनातन धर्म: कालातीत ज्ञान की प्रासंगिकता

परिचय (Introduction) तीव्र गति से बदलते, तकनीकी रूप से उन्नत आधुनिक युग में, जहाँ क्षणभंगुर प्रवृत्तियाँ हावी हैं और भौतिकवाद की दौड़ हर दिन तेज हो रही है, “सनातन धर्म” की अवधारणा एक शाश्वत और स्थिर प्रकाश स्तंभ के रूप में खड़ी है। यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत तरीका, एक सार्वभौमिक नैतिक संहिता और अस्तित्व के गहरे सत्यों को समझने का एक दार्शनिक ढाँचा है। ‘सनातन’ शब्द का अर्थ है ‘शाश्वत’ या ‘जो हमेशा से है’, और ‘धर्म’ का अर्थ है ‘धारण करने वाला’, ‘कर्तव्य’, ‘नैतिकता’, या ‘जीवन का नियम’। इस प्रकार, सनातन धर्म का शाब्दिक अर्थ है ‘शाश्वत नियम’ या ‘जीवन का शाश्वत मार्ग’। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं किया गया है, बल्कि यह ऋषियों, मुनियों और आत्मज्ञानी द्रष्टाओं द्वारा सहस्राब्दियों के आध्यात्मिक अनुभव और गहन चिंतन का परिणाम है। आज, जब मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ रही हैं, सामाजिक ताने-बाने में तनाव दिख रहा है, और व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर भ्रमित हैं, तो आधुनिक जीवन में सनातन धर्म के सिद्धांत अद्वितीय प्रासंगिकता प्रस्तुत करते हैं। यह हमें न केवल व्यक्तिगत शांति और सद्भाव प्राप्त करने में मदद करता है, बल्कि एक अधिक न्यायपूर्ण, नैतिक और टिकाऊ समाज के निर्माण के लिए भी एक मार्ग प्रदान करता है। यह लेख आधुनिक जीवन की चुनौतियों के संदर्भ में सनातन धर्म के महत्व, ऐतिहासिक संदर्भ और उसकी गहन प्रासंगिकता का अन्वेषण करेगा, जिसमें प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों और व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। विस्तार (Explanation) आधुनिक जीवन में सनातन धर्म की विशालता और गहराई को कुछ ही शब्दों में समेटना कठिन है, लेकिन इसके कुछ केंद्रीय सिद्धांत हैं जो आधुनिक जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 1. धर्म: नैतिक और धार्मिक कर्तव्य का मार्ग सनातन धर्म में ‘धर्म’ केंद्रीय अवधारणा है। यह केवल ‘धर्म’ के अंग्रेजी अर्थ से कहीं अधिक व्यापक है। धर्म का अर्थ है वह जो धारण करता है, जो व्यवस्था बनाए रखता है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवस्था, ब्रह्मांडीय संतुलन और नैतिक आचरण का प्रतीक है। महाभारत में कहा गया है: “धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥” (वनपर्व, 213.116) – अर्थात्, “जो धारण करता है, वही धर्म है; धर्म ही प्रजा को धारण करता है। जिसमें धारण करने की शक्ति है, वही धर्म है, यह निश्चित है।” आधुनिक जीवन में, जहाँ अनैतिकता और अवसरवादिता अक्सर पनपती है, धर्म का सिद्धांत व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों, नैतिक मूल्यों और सही आचरण का पालन करने के लिए प्रेरित करता है, भले ही तत्काल परिणाम प्रतिकूल लगें। यह हमें सिखाता है कि सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, दान और आत्म-नियंत्रण केवल धार्मिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि एक सुखी और सार्थक जीवन के लिए आवश्यक आधारशिलाएँ हैं। उदाहरण के लिए, व्यावसायिक नैतिकता (business ethics), पर्यावरणीय जिम्मेदारी (environmental responsibility) और सामाजिक न्याय (social justice) की अवधारणाएँ सीधे धर्म के सिद्धांतों से निकली हैं। एक सच्चा व्यापारी धर्म का पालन करेगा, अपने ग्राहकों को धोखा नहीं देगा और अपने कर्मचारियों का शोषण नहीं करेगा। 2. कर्म: क्रिया और परिणाम का सार्वभौमिक नियम कर्म का नियम आधुनिक जीवन में सनातन धर्म का एक और मौलिक सिद्धांत है। यह बताता है कि प्रत्येक क्रिया का एक समान और विपरीत परिणाम होता है, और यह परिणाम अंततः कर्ता को ही भोगना पड़ता है। “यथा बीजं विना क्षेत्रं नोप्तं फलति कर्हिचित्। तथा कर्म विना देही न तिष्ठति कदाचन॥” (गरुड़ पुराण) – “जैसे बिना खेत के बीज फल नहीं देता, वैसे ही कर्म के बिना कोई भी प्राणी क्षण भर भी नहीं रहता।” भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” (भगवद गीता 2.47) – “कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मों के फल की इच्छा वाले मत बनो और न ही तुम्हारी कर्म न करने में आसक्ति हो।” https://www.bhagavad-gita.us/bhagavad-gita-2-67/ आधुनिक युग में, जहाँ त्वरित लाभ और शॉर्टकट की तलाश आम है, कर्म का सिद्धांत हमें दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारे निर्णय और कार्य, चाहे वे कितने भी छोटे क्यों न हों, हमारे भविष्य और दूसरों के भविष्य को प्रभावित करते हैं। यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ावा देता है और हमें आत्म-निरीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है। साइबरबुलिंग, कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य अंततः नकारात्मक कर्म उत्पन्न करते हैं, जो व्यक्ति और समाज दोनों को प्रभावित करते हैं। कर्म का सिद्धांत हमें अपनी चेतना में कार्य करने और दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने की…

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कर्म और भाग्य का रहस्य (Karma vs Fate)

परिचय कर्म और भाग्य—ये दो शब्द न केवल भारतीय दर्शन के गहरे रहस्यों को दर्शाते हैं बल्कि हमारे जीवन के अनुभवों और निर्णयों पर भी इनमें गहरा प्रभाव होता है। जहाँ karma (कर्म) हमारे कर्मों और उनके परिणामों की प्रक्रिया को सूचित करता है, वहीं fate (भाग्य) को जीवन में पूर्वनियोजित घटनाओं और नियति के रूप में समझा जाता है। यह विषय केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि आज के युग में हमारी मानसिकता, प्रयासों, और जीवन के उतार-चढ़ाव के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। भारत के प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक भारतीय ज्योतिषशास्त्र तक, कर्म और भाग्य के विषय में ज्ञान विस्तृत है। इस लेख में हम कर्म और भाग्य की परिभाषा, उनके बीच के संबंध, और आधुनिक जीवन में उनके अनुप्रयोग को गहराई से समझेंगे। साथ ही विज्ञान और सांस्कृतिक संदर्भ में भी इनकी प्रासंगिकता पर चर्चा करेंगे। विस्तार (Explanation) कर्म (Karma) क्या है? संस्कृत शब्द “कर्म” का अर्थ है “कार्य”, इसका दायरा हमारे द्वारा किया गया हर शारीरिक, मौखिक या मानसिक कार्य है। लेकिन कर्म केवल क्रिया नहीं, बल्कि उनके परिणामों का चक्र भी है। कर्म सिद्धांत के अनुसार, हमारे कर्मों का फल अवश्यम्भावी होता है और वह न केवल वर्तमान जन्म में, बल्कि पुनर्जन्मों के चक्र में भी लागू होता है। सरल शब्दों में, हम जो करते हैं, उसका प्रभाव अनिवार्य रूप से हमें मिलता है। भाग्य (Fate) क्या है? भाग्य को नियति, प्राकृत भविष्य या पूर्वनिर्धारित जीवन पथ के रूप में समझा जा सकता है। भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि कुछ घटनाएं और परिस्थितियां हमारी चेतना से परे एक उच्च शक्ति या ब्रह्मांडीय नियम के अधीन होती हैं, जिन्हें हम भाग्य के नाम से जानते हैं। भाग्य जीवन की उन परिस्थितियों का सूचक है, जिन्हें हम बदल नहीं सकते, लेकिन उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ सकते हैं। ग्रंथों और अनुभवों का संदर्भ भगवद गीता में कर्म ज्ञान का विस्तृत उल्लेख है। गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं: भगवान कृष्ण कहते हैं,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (गीता 2.47),जिसका अर्थ है कि कर्म करने में हमारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में नहीं। यह दृष्टिकोण कर्म के प्रति हमारी जिम्मेदारी और फल की अनिश्चितता को दर्शाता है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में भी कर्म और भाग्य का अद्भुत समावेश है। जन्मकुंडली के विभिन्न भाव और ग्रह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कर्म और भाग्य की भूमिका बताते हैं। कर्म और भाग्य का आधुनिक जीवन में अनुप्रयोग वर्तमान विज्ञान और तकनीकी उन्नति के युग में भी कर्म और भाग्य की अवधारणा समान रूप से प्रासंगिक है। भाग्य जीवन में अवसर, प्रतिभा और कुछ सुरुआती परिस्थिति देता है, पर कर्म वह निरंतर प्रयास है जो सफलता, संतुष्टि और स्थायित्व सुनिश्चित करता है। धार्मिक, सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर हमें यह समझना आवश्यक है कि भाग्य हमें एक दिशा देता है, लेकिन कर्म हमारे जीवन को आकार देता है। मुख्य बिंदु (Key Points) Read this : https://www.gitasupersite.iitk.ac.in/srimad?htrskd=1&httyn=1&htshg=1&scsh=1&choos=&&language=dv&field_chapter_value=2&field_nsutra_value=47 विज्ञान और संस्कृति के संदर्भ में कर्म और भाग्य विज्ञान की दृष्टि से न्यूटन के गति नियमों के अनुसार हर क्रिया की प्रतिक क्रिया होती है, जो कर्म के सिद्धांत से सुसंगत है। न्यूरोसाइंस बताती है कि हमारे मानसिक और शारीरिक कर्म हमारे मस्तिष्क और व्यवहार में बदलाव लाते हैं। इस प्रकार, कर्म एक जीवंत, कालानुकूल सिद्धांत है। भाग्य को आधुनिक विज्ञान में पूर्ण नियति के बजाय संभावनाओं और आकस्मिकताओं से जोड़कर देखा जाता है। भौतिकी के क्वांटम सिद्धांत में अनिश्चितता के सिद्धांत के कारण भविष्य के कुछ तत्व निश्चित नहीं होते, जो भाग्य की अपर्याप्तता को दर्शाता है। आधुनिक संस्कृति में प्रभाव आज की युवा पीढ़ी में भाग्य को लेकर आकांक्षाएँ और भ्रम दोनों हैं। जबकि कई युवा सफलता के लिए भाग्य को जिम्मेदार ठहराते हैं, कर्म पर आधारित जीवन दृष्टिकोण उन्हें सशक्त बनाता है। समाज में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों के संगम पर कर्म की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सारांश (Summary) इस लेख में हमने कर्म और भाग्य के रहस्य को प्रभूत गहनता से समझा। कर्म वे कार्य और प्रयास हैं जिन्हें हम स्वयं नियंत्रित कर सकते हैं और ये हमारे पुनर्जन्मों के चक्र तक के लिए फलदायी होते हैं। भाग्य उन परिस्थितियों का समूह है जो एक उच्च शक्ति या नियति द्वारा निर्धारित होता है। भारतीय धार्मिक ग्रंथों जैसे Bhagavad Gita और उपनिषदों में कर्म की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आती है, और भारतीय ज्योतिषशास्त्र भी कर्म और भाग्य को ग्रहों और भावों के माध्यम से समझाता है। आधुनिक विज्ञान भी कर्म के सिद्धांत का समर्थन करता है जबकि भाग्य को संभावनाओं के संदर्भ में देखता है। आज…

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रक्षाबंधन: भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का उत्सव और इसके गहरे सामाजिक मायने

भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का माध्यम भी होते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक त्योहार है रक्षाबंधन (Raksha Bandhan)। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, और इस वर्ष, यह 9 अगस्त 2025 (शनिवार) को आ रहा है। यह दिन भाई और बहन के बीच के अटूट प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति कर्तव्य और सुरक्षा के वचन को समर्पित है। हालांकि, रक्षाबंधन का महत्व केवल भाई-बहन के रिश्ते तक ही सीमित नहीं है। इतिहास और पौराणिक कथाओं में इसके कई ऐसे संदर्भ मिलते हैं, जो दर्शाते हैं कि यह त्योहार राजाओं और प्रजा के बीच, गुरु और शिष्य के बीच, तथा सैनिकों और राष्ट्र के बीच भी सुरक्षा, सम्मान और एकजुटता के बंधन का प्रतीक रहा है। यह सामाजिक सद्भाव, नारी के सम्मान और एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का उत्सव है। इस विस्तृत लेख में, हम रक्षाबंधन के ऐतिहासिक, पौराणिक और सामाजिक पहलुओं पर गहराई से प्रकाश डालेंगे। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि कैसे एक साधारण धागा (राखी) इतना शक्तिशाली बंधन बन जाता है, इसकी विभिन्न कथाएं क्या हैं, पूजा विधि क्या है, और कैसे यह त्योहार बदलते समय के साथ अपने मूल अर्थ को बनाए रखते हुए, सामाजिक एकजुटता का संदेश देता है। रक्षाबंधन क्या है और यह कब मनाया जाता है? (What is Raksha Bandhan & When is it Celebrated?) रक्षाबंधन शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘रक्षा’ जिसका अर्थ है सुरक्षा, और ‘बंधन’ जिसका अर्थ है बांधना या बंधन। इस प्रकार, रक्षाबंधन का अर्थ है ‘सुरक्षा का बंधन’। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर एक पवित्र धागा (राखी) बांधती हैं, जो भाई की लंबी आयु, सफलता और सुरक्षा की कामना का प्रतीक होता है। बदले में, भाई अपनी बहन को हर परिस्थिति में उसकी रक्षा करने और उसका साथ देने का वचन देता है। पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन का महत्व (Mythological Significance of Raksha Bandhan) रक्षाबंधन की परंपरा कई सदियों पुरानी है और इसके पीछे अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इस त्योहार के गहरे अर्थ को बताती हैं: 1. इंद्र और इंद्राणी की कथा (महाभारत काल) यह सबसे प्राचीन कथाओं में से एक है। महाभारत के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध चल रहा था, जिसमें देवता हारने लगे थे। भगवान इंद्र (देवताओं के राजा) भी असुरों के राजा बलि से भयभीत थे। तब इंद्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी ने इंद्राणी को एक पवित्र धागा दिया और कहा कि इसे अपने पति की कलाई पर बांध दें, यह उनकी रक्षा करेगा। इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर वह धागा बांधा, जिसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। यह कथा दर्शाती है कि राखी केवल भाई-बहन के लिए नहीं, बल्कि किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए सुरक्षा और जीत का प्रतीक हो सकती है जिसकी हमें रक्षा करनी है। 2. द्रौपदी और भगवान कृष्ण की कथा (महाभारत काल) यह रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध और भावनात्मक कथा है। जब शिशुपाल का वध करते समय भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी और उसमें से रक्त बह रहा था, तब पास बैठी द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस निस्वार्थ कार्य से कृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रौपदी को आजीवन हर संकट से बचाने का वचन दिया। जब कौरवों द्वारा द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, तब कृष्ण ने अपने वचन को पूरा करते हुए उनके सम्मान की रक्षा की। यह कथा भाई-बहन के बीच के पवित्र और अटूट रिश्ते को दर्शाती है, जहाँ वचनबद्धता और रक्षा का सर्वोच्च महत्व है। 3. राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा (वामन अवतार) भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी और छलपूर्वक उनका सारा राज्य पाताल लोक भेज दिया। राजा बलि भगवान विष्णु के परम भक्त थे, इसलिए उन्होंने विष्णु जी से पाताल लोक में उनके साथ निवास करने का आग्रह किया। भगवान विष्णु राजा बलि के साथ रहने लगे, जिससे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गईं। श्रावण पूर्णिमा के दिन, देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के पास जाकर उन्हें राखी बांधी और उन्हें अपना भाई बनाया। राखी के बदले में, बलि ने देवी लक्ष्मी से वर मांगने को कहा। देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ लौटाने का वर मांगा। इस प्रकार, राजा…

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नाग पंचमी: भारतीय संस्कृति में सर्प पूजा का महत्व, पौराणिक कथाएं और पर्यावरण से संबंध

भारतीय संस्कृति में प्रकृति और उसके हर जीव का सम्मान किया जाता है। पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षियों तक, सभी को किसी न किसी रूप में देवत्व प्रदान किया गया है। इसी कड़ी में, श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला नाग पंचमी का पर्व एक विशेष स्थान रखता है। यह वह दिन है जब भारतवर्ष में नागों को देवता के रूप में पूजा जाता है, उन्हें दूध पिलाया जाता है और उनकी लंबी आयु तथा परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच के गहरे संबंध, कृतज्ञता और सह-अस्तित्व का प्रतीक भी है। इस वर्ष, नाग पंचमी 29 जुलाई, 2025 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। यह पर्व श्रावण मास के मध्य में आता है, जब वर्षा ऋतु अपने चरम पर होती है। इस विस्तृत लेख में, हम नाग पंचमी के विविध पहलुओं पर गहराई से विचार करेंगे: इसका पौराणिक आधार क्या है, भारतीय संस्कृति में सर्प को क्यों इतना सम्मान दिया गया है, इस पर्व के पीछे के वैज्ञानिक और पर्यावरणीय तर्क क्या हैं, इसकी पूजा विधि क्या है और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसे कैसे अनूठे तरीके से मनाया जाता है। हम कालसर्प दोष और सर्प संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा करेंगे। नाग पंचमी क्या है और यह कब मनाई जाती है? (What is Nag Panchami & When is it Celebrated?) नाग पंचमी हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो श्रावण (सावन) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन नाग देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है। इस दिन भक्त नागों की प्रतिमाओं, चित्रों या मिट्टी के नागों की पूजा करते हैं, उन्हें दूध, फूल, हल्दी, कुमकुम आदि चढ़ाते हैं। पौराणिक कथाओं में नाग पंचमी का महत्व (Mythological Significance of Nag Panchami) नाग पंचमी के पीछे कई प्रसिद्ध पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं, जो सर्पों को देवत्व प्रदान करती हैं: 1. कृष्ण और कालिया नाग का मर्दन (कालिया दमन) यह नाग पंचमी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। यमुना नदी में कालिया नामक एक विशाल और विषैला नाग रहता था, जिसके विष के कारण नदी का जल दूषित हो गया था और गोकुलवासियों को बहुत कष्ट हो रहा था। भगवान कृष्ण ने बालक रूप में ही कालिया नाग के फन पर नृत्य करके उसे परास्त किया और उसे यमुना नदी छोड़कर समुद्र में जाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि जिस दिन कृष्ण ने कालिया का मर्दन किया था, वह श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन था। यह कथा बुराई पर अच्छाई की जीत और पर्यावरण को विष से मुक्त करने का प्रतीक है। 2. आस्तिक मुनि और नागों की रक्षा एक अन्य महत्वपूर्ण कथा महाभारत काल से संबंधित है। परीक्षित राजा के पुत्र जन्मेजय ने तक्षक नाग द्वारा अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए एक विशाल ‘सर्प यज्ञ’ का आयोजन किया था, जिसमें संसार के सभी नाग अग्नि में भस्म हो रहे थे। तब ऋषि आस्तिक मुनि, जिनकी माता नागिन मनसा देवी थीं, ने इस यज्ञ को श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन रोककर नागों के वंश को विलुप्त होने से बचाया था। इस घटना के उपलक्ष्य में नाग पंचमी मनाई जाती है और नागों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। 3. समुद्र मंथन में वासुकी नाग की भूमिका क्षीरसागर के समुद्र मंथन के दौरान, देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में प्रयोग किया। वासुकी नाग ने इस प्रक्रिया में भयंकर विष उगला, जिसे भगवान शिव ने पीकर ‘नीलकंठ’ कहलाए। इस घटना में वासुकी की महत्वपूर्ण भूमिका नागों के देवत्व और ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को दर्शाती है। 4. शिव और सर्प का संबंध भगवान शिव को ‘नागभूषण’ कहा जाता है, क्योंकि वे अपने गले में वासुकी नाग को धारण करते हैं। यह दर्शाता है कि शिव स्वयं सर्पों को नियंत्रित करते हैं और उन्हें अपने आभूषण के रूप में स्वीकार करते हैं। शिव के साथ नागों का यह संबंध उन्हें भय से परे और उनके रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है। श्रावण मास शिव का प्रिय महीना है, और नाग पंचमी इसी माह में पड़ती है, जो शिव भक्तों के लिए इसका महत्व और बढ़ा देती है। 5. नागों का दैवीय महत्व हिन्दू धर्म में, नागों को धन, समृद्धि और प्रजनन क्षमता का प्रतीक भी माना जाता है। वे पाताल लोक के संरक्षक हैं और अक्सर पृथ्वी के खजाने से जुड़े होते हैं। अनन्त नाग,…

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शिवलिंग पर तांबे के पात्र से दूध क्यों नहीं चढ़ाना चाहिए?

आज सावन सोमवार के दिन मैं मंदिर गया तो पुजारी जी बता रहे थे कि तांबे के पात्र में शिवलिंग पर दूध नहीं चढ़ाना चाहिए। फिर मैंने अपना पात्र देखा जो तांबे का था, और उसमें जल व दूध दोनों ही मिला हुआ था। मैंने कुछ कहा नहीं, लेकिन यह बात मेरे मन में अटक गई कि आख़िर क्यों नहीं चढ़ाना चाहिए? मैंने तो दोनों मिलाकर ही चढ़ा दिया था। परंतु यही सोच रहा था कि इसके पीछे का धार्मिक, शास्त्रीय कारण क्या हो सकता है? साथ ही वैज्ञानिक कारण भी लोगों को जानना चाहिए। इसी उद्देश्य से यह लेख लिख रहा हूं, और साथ ही कुछ प्रमाणिक संदर्भ (references) भी दे रहा हूं। धार्मिक और शास्त्रीय कारण 1. अगम शास्त्रों में निषेध कामिकागम (Kāmikāgama), पूर्व भाग:“ताम्र पात्रेण क्षीरं न समर्पयेत्। क्षीरोपचारे पात्रं रौप्यं वा मृत्तिकं शुभम्।” अर्थ: तांबे के पात्र से दूध अर्पित नहीं करना चाहिए। इसके लिए चांदी या मिट्टी का पात्र शुभ माना गया है। 2. शिव पुराण में उल्लेख https://mahashivpuran.wordpress.com/2019/03/27/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF-11/शिव पुराण, रुद्र संहिता, अध्याय 11:“ताम्र पात्रेण गंगाजलमपि सम्प्रयुक्तं भवेत् पवित्रम्। न क्षीरं तु तस्मिन पात्रेण शिवे समर्पणीयम्।” अर्थ: तांबे के पात्र से गंगाजल चढ़ाना पवित्र माना गया है, लेकिन दूध उसी पात्र से शिवलिंग पर अर्पण करना अनुचित है। 3. धर्मसूत्रों का दृष्टिकोण गौतम धर्मसूत्र 8.18:“शुद्धं द्रव्यमेव देवानां प्रीणनाय भवति।” भावार्थ: केवल शुद्ध और सात्विक द्रव्य ही देवताओं को संतुष्ट करते हैं। यदि पात्र के कारण दूध दूषित हो जाए, तो वह पूजन योग्य नहीं माना जाता। 4. चरक संहिता का दृष्टिकोण चरक संहिता, सूत्रस्थान 27.297:“ताम्रं क्षीरसंगमात् विषवत् संप्रकल्पते।” अर्थ: तांबे और दूध का मिलन विष के समान प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। वैज्ञानिक विश्लेषण तांबे में मौजूद तत्व दूध के लैक्टिक एसिड और प्रोटीन से प्रतिक्रिया कर हानिकारक तत्व बना सकते हैं।जब दूध में जल मिला दिया जाए, तो प्रतिक्रिया की तीव्रता थोड़ी कम हो जाती है, क्योंकि लैक्टिक एसिड की सांद्रता घट जाती है। इससे रासायनिक प्रतिक्रिया धीमी होती है, और दूध थोड़ी देर तक खराब नहीं होता। परंतु यह केवल अस्थायी राहत है। अतः दूध और जल दोनों को अलग पात्रों में शिवलिंग पर चढ़ाना ही उचित है। निष्कर्ष 🔸 जल मिलाने पर तांबे के पात्र में दूध जल्दी खराब नहीं होता, लेकिन यह केवल प्रतिक्रिया को धीमा करता है, रोकता नहीं।🔸 धार्मिक दृष्टि से तांबे से दूध चढ़ाना वर्जित है।🔸 वैज्ञानिक दृष्टि से तांबे और दूध का संपर्क खतरनाक हो सकता है।🔸 आयुर्वेद भी इसे विष समान मानता है।🔸 इसलिए शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लिए स्टील, चांदी या मिट्टी के पात्र का उपयोग करें।🔸 तांबे का उपयोग केवल जल अर्पण के लिए करें। संदर्भ सूची 1. कामिकागम पूर्वपद – अभिषेक विधि2. शिव पुराण – रुद्र संहिता, अध्याय 113. गौतम धर्मसूत्र 8.184. चरक संहिता – सूत्रस्थान 27.297 click here to read some more https://theswadeshscoop.com/top-10-indian-spiritual-youtube-channels-2025-updated/https://theswadeshscoop.com/top-10-indian-spiritual-youtube-channels-2025-updated/

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