संस्कृत और क्वांटम फिज़िक्स: क्या प्राचीन भारतीय ग्रंथों में छिपे हैं ब्रह्मांड के गहरे रहस्य?

The Swadesh Scoop भूमिका: विज्ञान और दर्शन के बीच की खाई आधुनिक विज्ञान, विशेष रूप से क्वांटम फिज़िक्स, आज जिस दौर से गुजर रहा है, वहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है, बल्कि यह है कि वास्तविकता (Reality) आखिर है क्या। बीसवीं सदी के आरंभ में जब क्वांटम यांत्रिकी का विकास हुआ, तब वैज्ञानिकों को यह स्वीकार करना पड़ा कि प्रकृति को केवल पारंपरिक भौतिक नियमों से समझना संभव नहीं है। पदार्थ, ऊर्जा, समय और स्थान — सभी को देखने का दृष्टिकोण बदल गया। इसी बीच कई विद्वानों और शोधकर्ताओं का ध्यान इस ओर गया कि जिन प्रश्नों से आज आधुनिक विज्ञान जूझ रहा है, उन पर भारतीय दर्शन और संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही गहन चिंतन मौजूद है। यह लेख इसी विचार की गहराई से पड़ताल करता है — बिना यह दावा किए कि प्राचीन ग्रंथ आधुनिक विज्ञान को “सिद्ध” करते हैं, बल्कि यह दिखाने के लिए कि दोनों एक ही वास्तविकता को अलग-अलग भाषा और दृष्टिकोण से समझने का प्रयास कर रहे हैं। क्वांटम फिज़िक्स और चेतना (Consciousness) का प्रश्न क्वांटम फिज़िक्स का सबसे मूलभूत और विवादास्पद विषय चेतना की भूमिका है। क्लासिकल फिज़िक्स यह मानती थी कि ब्रह्मांड एक मशीन की तरह काम करता है — observer का कोई विशेष महत्व नहीं है। लेकिन क्वांटम प्रयोगों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया। https://en.wikipedia.org/wiki/Observer_effect_(physics) डबल-स्लिट प्रयोग जैसे प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि जब तक किसी कण (particle) को observe नहीं किया जाता, तब तक वह किसी निश्चित अवस्था में नहीं होता। observation के क्षण में ही उसकी स्थिति तय होती है। इस प्रभाव को Observer Effect कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि observer केवल देखने वाला नहीं है, बल्कि वह प्रयोग के परिणाम को प्रभावित करता है।https://plato.stanford.edu/entries/qt-interpretations/ प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जॉन व्हीलर (John Wheeler) ने इसी संदर्भ में कहा था कि ब्रह्मांड तब तक अस्तित्व में नहीं आता, जब तक उसे देखा न जाए। यह कथन विज्ञान के इतिहास में एक बड़ा दार्शनिक मोड़ था, क्योंकि इसने चेतना को भौतिक वास्तविकता के केंद्र में ला दिया।https://www.scientificamerican.com/article/what-is-quantum-mechanics/ उपनिषदों में ब्रह्म और आत्मा की अवधारणा भारतीय दर्शन, विशेष रूप से उपनिषद, चेतना को किसी उप-उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि मूल तत्व के रूप में देखते हैं। उपनिषदों में ब्रह्म (Brahman) को सार्वभौमिक चेतना कहा गया है — वह चेतना जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। वहीं आत्मा (Atman) को व्यक्तिगत चेतना के रूप में समझाया गया है। लेकिन उपनिषदों की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि वे ब्रह्म और आत्मा को अलग-अलग नहीं मानते। “अहं ब्रह्मास्मि” जैसे महावाक्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि व्यक्तिगत चेतना और सार्वभौमिक चेतना मूल रूप से एक ही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि observer और observed के बीच कोई अंतिम विभाजन नहीं है। https://plato.stanford.edu/entries/indian-philosophy/ यह दृष्टिकोण क्वांटम फिज़िक्स के observer effect (क्वांटम फिज़िक्स) से टकराता नहीं, बल्कि उसे एक गहरी दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है। “यथा दृष्टि, तथा सृष्टि” और वास्तविकता की प्रकृति भारतीय दर्शन में एक प्रसिद्ध कथन है — “यथा दृष्टि, तथा सृष्टि”, अर्थात जैसी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि का अनुभव होगा। यह कथन किसी मनोवैज्ञानिक या प्रेरक विचार से कहीं अधिक है। यह वास्तविकता की प्रकृति पर एक गहरा दार्शनिक वक्तव्य है। क्वांटम फिज़िक्स भी यही संकेत देती है कि वास्तविकता पूरी तरह objective नहीं है। यह संभावनाओं (probabilities) का एक क्षेत्र है, जो observation के क्षण में एक निश्चित रूप लेता है। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान और प्राचीन दर्शन, दोनों यह स्वीकार करते हैं कि हम जिस वास्तविकता का अनुभव करते हैं, वह हमारी चेतना से पूरी तरह अलग नहीं है। क्वांटम एंटैंगलमेंट और सार्वभौमिक संबंध क्वांटम फिज़िक्स का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है क्वांटम एंटैंगलमेंट। इसके अनुसार, यदि दो कण एक बार आपस में जुड़े (entangled) हों, तो उनके बीच की दूरी महत्वहीन हो जाती है। एक कण में परिवर्तन होते ही दूसरा कण तुरंत प्रतिक्रिया करता है, चाहे वह ब्रह्मांड के किसी भी कोने में हो। यह सिद्धांत स्थान और दूरी की पारंपरिक अवधारणाओं को चुनौती देता है। भारतीय दर्शन में इसी प्रकार की सोच “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे कथनों में दिखाई देती है, जहाँ पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखा गया है। यह केवल नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि एक गहरे interconnected reality की ओर संकेत करता है। कर्म, नॉन-लोकैलिटी और डेविड बोहम का दृष्टिकोण भारतीय दर्शन में कर्म का सिद्धांत यह बताता है कि हर क्रिया का प्रभाव केवल तत्काल और स्थानीय नहीं होता। कर्म का प्रभाव समय और स्थान…

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