जब आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड की उत्पत्ति की बात करता है, तो वह अक्सर हमें बिग बैंग की ओर ले जाता है—एक ऐसा क्षण जहाँ समय, स्थान और पदार्थ एक अत्यंत सघन बिंदु से फूट पड़े। लेकिन इस सिद्धांत के ठीक पहले क्या था? इस प्रश्न पर आते ही आधुनिक भौतिकी भी मौन हो जाती है। आश्चर्यजनक रूप से, यही मौन हमें हज़ारों वर्ष पहले रचे गए ऋग्वेद के एक अद्भुत मंत्र में भी मिलता है—नासदीय सूक्त (10.129)।https://www.sacred-texts.com/hin/rigveda/rv10129.htm
यह सूक्त किसी ईश्वर, सृष्टिकर्ता या निश्चित उत्तर की घोषणा नहीं करता। बल्कि यह सवाल करता है, संदेह करता है और अंततः स्वीकार करता है कि शायद कोई भी—यहाँ तक कि देवता भी—इस रहस्य को पूरी तरह नहीं जानते।
समय से पहले का शून्य: जब कुछ भी नहीं था

अधिकांश सृजन कथाएँ हमें सांत्वना देती हैं। वे कहती हैं कि “ईश्वर ने कहा” और संसार बन गया। लेकिन नासदीय सूक्त हमें असहज करता है। इसकी शुरुआत ही एक विचलित करने वाले कथन से होती है—उस समय न तो अस्तित्व था, न ही अनस्तित्व।
यह कथन साधारण नहीं है। यह भाषा की सीमाओं को तोड़ता है। “न होना” भी एक प्रकार का होना है, लेकिन यहाँ तो दोनों का निषेध है। आधुनिक भौतिकी में इसे हम pre-spacetime state कह सकते हैं—एक ऐसी अवस्था जहाँ न समय था, न स्थान, न कारण और न ही परिणाम।https://science.nasa.gov/universe/origin-evolution/big-bang/
आज 2026 तक भी, ब्रह्मांड विज्ञान इस प्रश्न पर अटक जाता है कि बिग बैंग से पहले क्या था, क्योंकि “पहले” शब्द ही समय की उपस्थिति मान लेता है। नासदीय सूक्त इस उलझन को पहले ही पहचान चुका था।
भाषा का विरोधाभास और वास्तविकता की सीमा
“न तो सत था, न असत”—यह पंक्ति केवल काव्य नहीं है। यह एक दार्शनिक विस्फोट है। यह बताती है कि मानव भाषा वास्तविकता को पूरी तरह पकड़ने में अक्षम है। यही बात आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि क्वांटम स्तर पर हमारी गणितीय भाषा भी लड़खड़ा जाती है।

इस सूक्त में कोई दावा नहीं, कोई घोषणा नहीं—केवल प्रश्न हैं। यह दृष्टिकोण आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से मेल खाता है, जहाँ अंतिम सत्य का दावा करने के बजाय निरंतर संदेह को महत्व दिया जाता है।
स्वर्ण बीज और सिंगुलैरिटी: हिरण्यगर्भ की अवधारणा
नासदीय सूक्त और वैदिक साहित्य में हिरण्यगर्भ का उल्लेख मिलता है—एक स्वर्णिम बीज, जिससे सृष्टि का विस्तार हुआ। आधुनिक भौतिकी में, बिग बैंग को भी एक gravitational singularity के रूप में समझा जाता है—असीम घनत्व और तापमान का एक बिंदु।
यह समानता केवल प्रतीकात्मक नहीं है। दोनों ही अवस्थाएँ ऐसी हैं जहाँ हमारे नियम टूट जाते हैं। हिरण्यगर्भ कोई देवता नहीं, बल्कि एक संभावना है—एक सुप्त अवस्था, जिसमें सब कुछ समाया हुआ है लेकिन कुछ भी प्रकट नहीं।
तपस: वह ऊर्जा जिसने शून्य को हिला दिया
सूक्त में कहा गया है कि सृष्टि से पहले “तपस” उत्पन्न हुआ। तपस को अक्सर तपस्या कहा जाता है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ है—आंतरिक ऊष्मा, ऊर्जा, तनाव।
आधुनिक विज्ञान में, बिग बैंग से ठीक पहले या उसके दौरान ऊर्जा का तीव्र विस्फोट हुआ, जिसने ब्रह्मांड का विस्तार शुरू किया। यह विस्तार केवल भौतिक नहीं था, बल्कि नियमों का भी था—कण, बल, समय, सब कुछ वहीं जन्मा।
तपस और ऊर्जा—दोनों ही निष्क्रिय अवस्था से सक्रिय अवस्था में परिवर्तन का संकेत हैं।
काम: पहला कंपन, पहला इरादा
नासदीय सूक्त कहता है कि सृष्टि की शुरुआत “काम” से हुई—इच्छा से। यह कोई भावनात्मक इच्छा नहीं, बल्कि पहला कंपन, पहली गति है।
क्वांटम भौतिकी में, शून्य पूर्णतः स्थिर नहीं होता। वहाँ निरंतर quantum fluctuations होती रहती हैं—अचानक उत्पन्न होने वाले कण और ऊर्जा। यह संभावना कि ब्रह्मांड एक आकस्मिक क्वांटम घटना से जन्मा हो, आज गंभीरता से ली जाती है।
काम और fluctuation—दोनों ही बिना कारण के आंदोलन का संकेत देते हैं।
जल का प्रतीक: द्रव नहीं, संभावना
सूक्त में “जल” का उल्लेख है, लेकिन यह भौतिक जल नहीं है। यह एक fluid-like अवस्था का प्रतीक है—जहाँ सब कुछ अनिश्चित, प्रवाही और अस्थिर है।
आज वैज्ञानिक क्वांटम वैक्यूम को भी कुछ इसी तरह वर्णित करते हैं—एक ऐसा क्षेत्र जो खाली दिखता है, लेकिन ऊर्जा से भरा होता है। यह समानता इस बात का संकेत है कि प्राचीन ऋषि भौतिक वस्तुओं से अधिक अवस्थाओं की बात कर रहे थे।
ऋषियों की महान शंका: क्या देवता भी नहीं जानते?
नासदीय सूक्त का सबसे क्रांतिकारी भाग इसका अंत है। यह कहता है कि शायद सृष्टि का रहस्य वह भी नहीं जानता, जो सबसे ऊपर बैठा है।
यह कथन किसी भी धार्मिक ग्रंथ में दुर्लभ है। यहाँ ईश्वर सर्वज्ञ नहीं, बल्कि प्रश्नों के दायरे में है। यह बौद्धिक विनम्रता आधुनिक विज्ञान की आत्मा है—यह स्वीकार करना कि कुछ प्रश्नों के उत्तर हमारे पास नहीं हैं।
आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान और वैदिक चक्र

आधुनिक सिद्धांत जैसे Big Bounce यह प्रस्ताव रखते हैं कि ब्रह्मांड का अंत फिर से एक शून्य में होगा, और वहीं से नई सृष्टि जन्म लेगी। वैदिक दर्शन में भी समय रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय है—सृष्टि, स्थिति और प्रलय का अनंत क्रम।
यह प्रश्न उठता है—क्या हम किसी एकमात्र ब्रह्मांड में नहीं, बल्कि एक अनंत श्रृंखला के एक चरण में जी रहे हैं?
क्या सत्य जानना असंभव है?
नासदीय सूक्त हमें उत्तर नहीं देता, बल्कि हमें ईमानदार बनाता है। यह कहता है कि शायद ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक ऐसा रहस्य है, जिसे जानने के लिए ब्रह्मांड ने ही हमें अक्षम बनाया है।
आधुनिक विज्ञान भी अब इसी निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा है—कि कुछ सीमाएँ मौलिक हैं, तकनीकी नहीं।

निष्कर्ष: जब प्राचीन ज्ञान भविष्य से मिलता है
नासदीय सूक्त कोई विज्ञान-पुस्तक नहीं है, और न ही यह कोई धर्म-प्रचार है। यह एक दार्शनिक दस्तावेज़ है, जो हमें सिखाता है कि प्रश्न पूछना उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
जब आधुनिक भौतिकी अपने सबसे गहरे प्रश्नों पर ठहर जाती है, तब यह सूक्त हमें याद दिलाता है—कि संदेह कमजोरी नहीं, बल्कि ज्ञान की शुरुआत है।
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