प्रस्तावना: कार्तिक मास की महिमा
कार्तिक मास हिंदू पंचांग का आठवां महीना है, जिसे सभी महीनों में सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। इस पूरे माह में किया गया स्नान, दान और तपस्या अनंत पुण्य फल प्रदान करती है। इस मास के अंतिम दिन आने वाली पूर्णिमा तिथि का महत्व तो स्वयं शास्त्रों ने भी गाया है। इसे ‘कार्तिक पूर्णिमा’ या ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है और दिवाली के ठीक पंद्रह दिन बाद मनाए जाने के कारण यह पर्व ‘देव दीपावली’ के नाम से भी विख्यात है। यह पर्व देवताओं के पृथ्वी पर उतरने और अपनी दिवाली मनाने का प्रतीक है, जो विशेष रूप से काशी (वाराणसी) के घाटों पर अपनी अलौकिक छटा बिखेरता है।
कार्तिक पूर्णिमा / देव दीपावली 2025 की तारीख और शुभ मुहूर्त
हिंदू धर्म में किसी भी पर्व की तिथि और मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। वर्ष 2025 में, कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की तारीख और शुभ मुहूर्त निम्नलिखित है:
| विवरण | तिथि / समय |
| कार्तिक पूर्णिमा की तारीख | बुधवार, 5 नवंबर 2025 |
| पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ | 4 नवंबर 2025, रात्रि 10 बजकर 36 मिनट से |
| पूर्णिमा तिथि का समापन | 5 नवंबर 2025, शाम 06 बजकर 48 मिनट तक |
| देव दीपावली दीपदान मुहूर्त | शाम 05 बजकर 15 मिनट से शाम 07 बजकर 50 मिनट तक (प्रदोष काल) |
नोट: उदया तिथि के अनुसार, यह पर्व 5 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा, और दीपदान हमेशा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद और रात्रि होने से पहले) में करना शुभ माना जाता है। https://www.drikpanchang.com/diwali/dev-diwali/dev-deepawali-date-time.html?lang=hi
कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
कार्तिक पूर्णिमा एक ऐसा दिन है जब शैव और वैष्णव, दोनों ही संप्रदायों के प्रमुख देवता पूजे जाते हैं। इस दिन स्नान, दान, दीपदान और भगवान के भजन-पूजन का विशेष महत्व है।
1. गंगा स्नान और दान का महात्म्य

शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा, यमुना, गोदावरी या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने को ‘कार्तिक स्नान’ कहा जाता है, जो अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण, इसे ‘महाकार्तिकी’ पूर्णिमा भी कहा जाता है।
2. गुरु नानक जयंती (प्रकाश पर्व)

सिख समुदाय के लिए भी यह दिन अत्यंत पवित्र है, क्योंकि इसी दिन सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु, श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। इसलिए, सिख धर्मावलंबी इस दिन को ‘प्रकाश पर्व’ के रूप में मनाते हैं और गुरुद्वारों में विशेष अरदास और लंगर का आयोजन करते हैं।
3. तुलसी पूजा का समापन
कार्तिक मास की एकादशी (देवउठनी एकादशी) को भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और इसी दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह होता है। पूर्णिमा के दिन तक तुलसी जी की पूजा का विधान चलता है, और इस दिन दीपदान करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक कथाएं और शास्त्र संदर्भ
इस पूर्णिमा के महत्व को बढ़ाने वाली तीन प्रमुख पौराणिक कथाएं हैं: https://hindi.webdunia.com/other-festivals/kartik-poornima-katha-118112300033_1.html
I. त्रिपुरासुर वध की कथा (त्रिपुरारी पूर्णिमा)

- शास्त्र संदर्भ: शिव पुराण, मत्स्य पुराण
- कथा: तारकासुर नामक राक्षस के तीन पुत्र थे – तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन तीनों ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त किया कि वे केवल तभी मारे जा सकते हैं जब कोई एक ही बाण से उनके तीन अलग-अलग नगरों (त्रिपुर) को नष्ट कर दे, और वह भी तब जब वे तीनों नगर एक सीध में आएं।
- वरदान पाकर तीनों असुरों ने देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव ने एक दिव्य रथ का निर्माण किया और जब संयोगवश तीनों नगर एक ही पंक्ति में आए, तब शिवजी ने अपने पिनाक धनुष से एक ही बाण चलाकर तीनों का विनाश कर दिया।
- यह घटना कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुई थी। असुरों पर विजय प्राप्त करने की खुशी में देवताओं ने स्वर्गलोक में दीये जलाकर खुशियाँ मनाई। इसी कारण भगवान शिव को ‘त्रिपुरारी’ कहा गया और इस पूर्णिमा को ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ या ‘देव दीपावली’ के नाम से जाना जाने लगा।
II. मत्स्य अवतार की कथा

- शास्त्र संदर्भ: मत्स्य पुराण
- कथा: वैष्णव मत के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए अपना प्रथम अवतार ‘मत्स्य अवतार’ धारण किया था।
- माना जाता है कि प्रलय काल में, जब पूरी पृथ्वी जलमग्न होने वाली थी, तब भगवान विष्णु ने एक मछली (मत्स्य) का रूप धारण किया और मनु को समस्त वेद, बीज और सप्त ऋषियों की रक्षा करने का आदेश दिया।
- इस कारण, यह दिन भगवान विष्णु के भक्तों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
III. सत्यनारायण व्रत कथा और चंद्रमा की कथा
इस दिन कई स्थानों पर भगवान सत्यनारायण (भगवान विष्णु का ही एक रूप) की कथा भी सुनी जाती है, जो सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। इसी दिन चंद्रमा भी अपनी सोलह कलाओं से युक्त होकर पूर्ण रूप से पृथ्वी को प्रकाशमान करते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा (त्रिपुरासुर कथा)
कार्तिक पूर्णिमा की व्रत कथा मुख्य रूप से त्रिपुरासुर के वध से जुड़ी है। व्रत रखने वाले भक्त कथा श्रवण के माध्यम से इस दिन के महत्व को समझते हैं:
व्रत कथा का सार:
पौराणिक काल में त्रिपुरासुर नाम का एक महाभयंकर असुर था, जिसके तीन पुत्रों ने ब्रह्माजी से अविनाशी होने का वरदान पा लिया था। इस वरदान के बल पर वे देवताओं और मनुष्यों को बहुत कष्ट देने लगे।
त्रिपुरासुर के पुत्रों ने पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल, तीनों लोकों पर अपना आतंक फैला दिया। देवताओं के राजा इंद्र समेत सभी देवता उनसे भयभीत होकर त्राहि-त्राहि करने लगे। अंततः, सभी देवतागण सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुँचे और त्रिपुरासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने देवताओं की करुण पुकार सुनी और त्रिपुरासुर तथा उसके पुत्रों का अंत करने का संकल्प लिया। उन्होंने एक अद्भुत और शक्तिशाली रथ का निर्माण किया। जिस दिन तीनों असुरों के नगर (त्रिपुर) एक सीधी रेखा में आए, उस दिन भगवान शिव ने एक ही बाण से तीनों का विनाश कर दिया।
त्रिपुरासुर का वध होते ही तीनों लोकों में शांति और खुशी छा गई। देवताओं ने आनंदित होकर भगवान शिव की जय-जयकार की और काशी के घाटों पर लाखों दीये जलाकर अपनी खुशी व्यक्त की। यही वह दिन था जब देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आज हम देव दीपावली के नाम से जानते हैं भगवान शिव ने देवताओं को आशीर्वाद दिया और उन्हें ‘त्रिपुरारी’ नाम से जाना जाने लगा। इस कथा के श्रवण से भक्तों के जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा / देव दीपावली की पूजा विधि और अनुष्ठान

कार्तिक पूर्णिमा का पर्व पवित्र स्नान, दीपदान और पूजन का पर्व है। पूजा-अर्चना का विधान निम्नलिखित है: https://www.punjabkesari.in/dharm/news/dev-deepawali-2235906
1. ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र स्नान (कार्तिक स्नान)
- भक्त इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा) में स्नान करते हैं।
- यदि नदी स्नान संभव न हो, तो घर पर ही सामान्य जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।
- स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर, ‘ॐ घृणिः सूर्याय नमः’ मंत्र का जप करना चाहिए।
2. व्रत का संकल्प और पूजा
- स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर, व्रत का संकल्प लें (यदि व्रत रखा हो)।
- पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल का छिड़काव करें।
- एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु (या सत्यनारायण) और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- भगवान शिव (त्रिपुरारी) की पूजा भी अवश्य करें।
3. पूजा सामग्री और विधान
- भगवान को धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई, पंचामृत), फूल (कमल या पीले फूल), तुलसी दल और रोली-चंदन अर्पित करें।
- भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करें या सुनें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
4. दीपदान का विशेष अनुष्ठान
- शाम के समय, प्रदोष काल में दीपदान का विशेष महत्व है।
- मंदिरों, घरों, तुलसी के पौधे के पास, पीपल के पेड़ के नीचे और विशेष रूप से पवित्र नदियों के घाटों पर मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं।
- काशी में गंगा घाट पर लाखों दीये जलाए जाते हैं, जिससे पूरा शहर जगमगा उठता है—यही देव दीपावली का मुख्य आकर्षण है।
- कम से कम 11, 21, 51 या 108 दीये जलाना शुभ माना जाता है।
5. दान-पुण्य और हवन
- इस दिन अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, कंबल और धन का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- कई लोग घर में या मंदिर में हवन का आयोजन भी करते हैं।
निष्कर्ष: दीपों से प्रकाशित जीवन
कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली का पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है। यह हमें जीवन में ज्ञान, प्रकाश और सात्विकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। गंगा के घाटों पर लाखों दीयों की रोशनी, मंदिरों में घंटियों की गूंज और भक्तों की आस्था का यह संगम हमें यह याद दिलाता है कि जब देवता स्वयं धरती पर उतरते हैं, तो यह जीवन भी एक उत्सव बन जाता है। इस पावन अवसर पर किया गया हर कार्य हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और मोक्ष के द्वार खोलता है।
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