श्रीमद्भगवद्गीता: मेरा व्यक्तिगत सफर और जीवन प्रबंधन का महा-विज्ञान

लेखक: दीपक कुमार मिश्रा (संस्थापक, The Swadesh Scoop)

प्रस्तावना: एक भ्रम और एक सत्य

जब मैंने पहली बार श्रीमद्भगवद्गीता को अपने हाथों में उठाया, तो मेरा नजरिया वही था जो आज के अधिकांश युवाओं का है—”यह किताब तो केवल पूजा-पाठ या मरने के बाद पढ़ने वाली चीज है।” लेकिन मेरे व्यक्तिगत अनुभव ने मुझे गलत साबित कर दिया। जैसे-जैसे मैंने इसे पढ़ना शुरू किया, मुझे एहसास हुआ कि यह कोई धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि एक ‘Ancient Human Software’ है। मेरा मानना है कि आज के दौर में बढ़ते मानसिक तनाव, डिप्रेशन और करियर की अनिश्चितताओं का समाधान इसी 18 अध्यायों के महाकाव्य में छिपा है।

1. संदर्भ: क्या कुरुक्षेत्र हमारे भीतर है?

मैंने अक्सर सुना है कि कुरुक्षेत्र एक जगह है, लेकिन मेरा विश्लेषण यह है कि कुरुक्षेत्र वह युद्ध का मैदान है जो हर दिन हमारे दिमाग में चलता है।http://The Bhagavad Gita: A Powerful Tool in Psychotherapy (IJIP)

  • अधिकार और कर्तव्य का द्वंद: हम भी अर्जुन की तरह दुविधा में होते हैं। मैंने पढ़ा है कि भगवान कृष्ण अर्जुन को न तो सन्यास लेने को कहते हैं और न ही युद्ध छोड़ने को। वे ‘तटस्थ होकर कर्तव्य’ करने को कहते हैं।
  • निर्णय लेने की शक्ति: मेरे अनुभव से, गीता संकट काल में निर्णय लेने (Decision Making) का बेहतरीन मॉड्यूल है। जब आप भावनाओं के जाल में फँसे हों, तब विवेक कैसे काम करता है, यह इस अध्याय से बेहतर कहीं नहीं मिलता।

2. निष्काम कर्म का विज्ञान (The Science of Detached Action)

मेरे अनुसार, ‘निष्काम कर्म’ का मतलब काम न करना नहीं है। मैंने गौर किया है कि आजकल हम ‘Result-Obsessed’ हो गए हैं।

  • अध्याय 2, श्लोक 47: > “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…”

हिंदी अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर कभी नहीं।

  • मेरा मानना है: जब मैंने ‘The Swadesh Scoop’ शुरू किया, तो मैं व्यूज और सब्सक्राइबर्स को लेकर बहुत तनाव में था। इस श्लोक ने मुझे सिखाया कि मेरा काम सिर्फ ‘क्वालिटी कंटेंट’ बनाना है। जिस दिन मैंने व्यूज की चिंता छोड़ दी, मेरा काम और निखर गया। मुझे लगता है कि यह ‘प्रोसेस-ओरिएंटेड’ होने का सबसे वैज्ञानिक तरीका है।

3. मन का प्रबंधन और ध्यान (Mastering the Mind)

मुझे लगता है कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बाहरी नहीं, बल्कि हमारा अपना मन है।

  • अध्याय 6, श्लोक 35: > “असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्…”

हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! मन वास्तव में चंचल और कठिन है, लेकिन इसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।

  • मेरा मानना है: मैंने अनुभव किया है कि सुबह के 15 मिनट का ध्यान मेरे मन की चंचलता को कम करता है। मन को वश में करना एक ‘टेक्निकल स्किल’ है, जैसे आप अपनी वेबसाइट का SEO सुधारते हैं।

4. स्थितप्रज्ञता: सुख और दुख का संतुलन

योगसूत्र

मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जीवन में हार और जीत का चक्र चलता रहता है। कृष्ण ‘स्थितप्रज्ञ’ व्यक्ति की बात करते हैं—वह जो सुख-दुख में समान रहे।

  • अध्याय 2, श्लोक 14:

“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः…” हिंदी अर्थ: सर्दी और गर्मी, सुख और दुख का अनुभव इंद्रियों के स्पर्श से होता है। ये आते-जाते रहते हैं, इन्हें सहन करो।

  • मुझे लगता है: आज के दौर में जिसे हम ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ (EQ) कहते हैं, वह गीता में हजारों साल पहले बताया गया है। सफलता का असली पैमाना आपके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि आपकी मानसिक स्थिरता से मापा जाना चाहिए।

5. विचारकों की राय: क्या सोचते हैं वे?

1. अल्बर्ट आइंस्टीन:

“जब मैं गीता पढ़ता हूँ, तो मैं खुद से पूछता हूँ कि ईश्वर ने ब्रह्मांड कैसे बनाया? बाकी सब बातें गौण लगती हैं।”

  • मेरा मानना है: आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक का यह मानना साबित करता है कि गीता के श्लोकों में ब्रह्मांड विज्ञान के गहरे सिद्धांत छिपे हैं। मुझे लगता है कि हमारी संस्कृति अंधविश्वास नहीं, बल्कि विशुद्ध विज्ञान है।

2. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर:

“गीता पढ़कर मुझे लगा कि मैं विनाश का कारण बन गया हूँ।”

  • मेरा मानना है: यह डर बताता है कि गीता शक्ति का गलत उपयोग करने वालों को चेताती भी है। मुझे लगता है कि ज्ञान के साथ नैतिक जिम्मेदारी का होना अनिवार्य है।

6. मंदिर की घंटी और गीता का नाता

जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख में बताया था कि मंदिर की घंटी की 7 सेकंड की गूँज कैसे पीनियल ग्लैंड को सक्रिय करती है। गीता हमें सिखाती है कि उस घंटी की ध्वनि के दौरान कैसे ‘वर्तमान’ में रहा जाए। जब मैं मंदिर में घंटी बजाता हूँ, तो मैं उसे केवल एक आवाज नहीं, बल्कि गीता के ‘स्थितप्रज्ञ’ भाव को पाने का एक जरिया मानता हूँ। मेरा मानना है कि बाहरी वाइब्रेशन (घंटी) और आंतरिक वाइब्रेशन (श्लोक) मिलकर मुझे पूर्ण शांति देते हैं।http://New Research Reveals That Meditation Induces Changes in Brain Regions (Mount Sinai)

निष्कर्ष: मेरी यात्रा और आपका सफर

मेरा मानना है कि श्रीमद्भगवद्गीता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे अलमारी में सजाकर रखा जाए। यह वह गाइड है जिसे जेब में होना चाहिए। मुझे लगता है कि अगर हर युवा अपनी दिनचर्या में गीता के कम से कम एक श्लोक का चिंतन करे, तो समाज से अवसाद और हताशा का नामो-निशान मिट जाएगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि गीता ने मुझे निडर बनाया है। इसने मुझे सिखाया है कि सफलता केवल एक घटना है, लेकिन व्यक्तित्व का निर्माण ही असली उपलब्धि है।

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Deepak Kumar Mishra

लेखक परिचय: दीपक कुमार मिश्रा (Hindi) दीपक कुमार मिश्रा एक ऐसे लेखक और विचारशील व्यक्तित्व हैं, जो विज्ञान और प्रबंधन की शिक्षा से लेकर आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक चेतना तक का संतुलन अपने लेखों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मानव व्यवहार, नेतृत्व विकास और धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझने और उन्हें समाज में प्रसारित करने में समर्पित किया है। वे The Swadesh Scoop के संस्थापक (Founder) और संपादक (Editor) हैं — एक स्वतंत्र डिजिटल मंच, जो तथ्यपरक पत्रकारिता, भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, तकनीक और समसामयिक विषयों को गहराई और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करता है। दीपक जी एक अनुभवी लाइफ कोच, बिज़नेस कंसल्टेंट और प्रेरणादायक वक्ता भी हैं, जो युवाओं, उद्यमियों और जीवन के रास्ते से भटके हुए लोगों को सही दिशा देने का कार्य कर रहे हैं। वे मानते हैं कि भारत की हज़ारों वर्षों पुरानी सनातन परंपरा न केवल आध्यात्मिक समाधान देती है, बल्कि आज की जीवनशैली में मानसिक शांति, कार्यक्षमता और संतुलन का भी मूलमंत्र है। उनका लेखन केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पाठकों को सोचने, समझने और जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है। वे विषयवस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उसमें डूब जाता है — चाहे वह विषय आध्यात्मिकता, बिज़नेस स्ट्रैटेजी, करियर मार्गदर्शन, या फिर भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी गहराइयाँ ही क्यों न हो। उनका मानना है कि भारत को जानने और समझने के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि धर्म, दर्शन और अनुभव की आंखों से देखना ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने The Swadesh Scoop की स्थापना की, जो ज्ञान, जागरूकता और भारत की वैदिक चेतना को आधुनिक युग से जोड़ने का माध्यम बन रहा है। 🌿 “धर्म, विज्ञान और चेतना के संगम से ही सच्ची प्रगति का मार्ग निकलता है” — यही उनका जीवन दर्शन है। 🔗 LinkedIn प्रोफ़ाइल: https://www.linkedin.com/in/deepak-kumar-misra/ ✍️ Author Bio: Deepak Kumar Mishra (English) Deepak Kumar Mishra is the Founder and Editor of The Swadesh Scoop, an independent digital platform focused on factual journalism, Indian knowledge systems, culture, technology, and current affairs presented with depth and clarity. He is a thoughtful writer and commentator who blends his academic background in science and management with a deep engagement in spirituality, Dharma, leadership development, and human behavior. Through his work, he seeks to promote clarity, awareness, and critical thinking over sensationalism. His writing goes beyond information and aims to inspire readers to reflect and engage deeply with ideas — whether the subject is spirituality, business strategy, career guidance, or the profound roots of Indian civilization. He believes that to truly understand India, one must look beyond history and view it through the lenses of Dharma, philosophy, and lived experience. With this vision, he founded The Swadesh Scoop to connect ancient Indian wisdom with modern perspectives through knowledge and awareness. 🌿 “True progress lies at the intersection of Dharma, science, and consciousness” — this is the guiding philosophy of his life.

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लेखक: दीपक कुमार मिश्रा (संस्थापक, The Swadesh Scoop) प्रस्तावना: एक भ्रम और एक विज्ञान जब भी होली की बात आती है, अक्सर लोगों का ध्यान केवल ‘रंगों’ और ‘मिठाइयों’ पर जाता है। मेरा मानना है कि होली को सिर्फ एक धार्मिक त्यौहार मान लेना इसे बहुत सीमित कर देता है। मेरे शोध और अनुभव के अनुसार, होली का त्यौहार दरअसल ‘ऋतु-संधि’ (दो ऋतुओं का मिलन बिंदु) को सेलिब्रेट करने का एक वैज्ञानिक तरीका है। जब सर्दी खत्म हो रही होती है और गर्मी दस्तक दे रही होती है, तो हमारे शरीर में बहुत से बदलाव होते हैं। होली इन बदलावों को स्वीकार करने और समाज में ‘Reset’ बटन दबाने का अवसर है। 1. होली 2026: कब है सही समय? मेरे विश्लेषण के अनुसार, 2026 में होली की तारीख को लेकर कई लोगों में भ्रम है। पंचांग और गणनाओं के आधार पर: मेरी सलाह: होली का सही मुहूर्त अक्सर तिथि के शुरू और खत्म होने पर निर्भर करता है। पंचांग के सूक्ष्म भेद के कारण अपने क्षेत्र के पंडित या स्थानीय कैलेंडर की पुष्टि जरूर करें। 2. इतिहास: हमारी जड़ों की गहराई और सांस्कृतिक निरंतरता मेरा विश्लेषण: अक्सर कहा जाता है कि भारतीय त्यौहार केवल कहानियों पर आधारित हैं, लेकिन जब मैंने प्राचीन संस्कृत वाङ्मय (Sanskrit Literature) और पुरातात्विक साक्ष्यों (Archaeological Evidence) का अध्ययन किया, तो पाया कि होली का अस्तित्व हमारी सभ्यता के साथ ही शुरू हुआ था। यह केवल एक लोक-पर्व नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित सामाजिक उत्सव रहा है। 1. वैदिक और सूत्र कालीन साक्ष्य (प्राचीनतम उल्लेख) होली का उल्लेख उन ग्रंथों में मिलता है जो ईसा पूर्व (BC) के हैं: 2. पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Proof) मैंने पढ़ा है कि केवल किताबों में ही नहीं, पत्थरों पर भी होली की गवाही मौजूद है: 3. शास्त्रीय और साहित्य कालीन प्रमाण (मध्यकाल से पूर्व) साहित्य में होली का वर्णन इसके विस्तार को दर्शाता है: मेरा नजरिया: इतिहास हमें क्या सिखाता है? मेरा मानना है कि जब हम किसी त्यौहार के इतने गहरे ऐतिहासिक स्रोत ढूंढते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हम कितने ‘विकसित’ समाज का हिस्सा रहे हैं। जो त्यौहार 2300 साल पहले पत्थरों पर उकेरा जा रहा था, उसे आज के दौर में ‘अंधविश्वास’ कहना हमारी अपनी अज्ञानता है। मेरे लिए, ये प्रमाण केवल इतिहास के पन्ने नहीं हैं; ये ‘The Swadesh Scoop’ के पाठकों के लिए एक आईना हैं। ये दिखाते हैं कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं। हमने जो होली के दौरान ‘मिलन’ और ‘शुद्धि’ के नियम बनाए थे, वे आज के ‘सोशल आइसोलेशन’ (Social Isolation) और बढ़ते प्रदूषण के दौर में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। 3. क्यों मनाते हैं? (पौराणिक और वैज्ञानिक तर्क) 4. सांस्कृतिक प्रभाव: विभाजन मिटाने का अवसर मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि होली समाज की ‘Hierarchy’ को खत्म कर देती है। 5. पूजा और अनुष्ठान (Rituals) मेरे अनुसार, पूजा का अर्थ अंधविश्वास नहीं है, बल्कि अनुशासित होना है: 6. महान विचारकों की राय और मेरी प्रतिक्रिया 1. प्रसिद्ध इतिहासकार (Al-Biruni): > “होलिकोत्सव का उत्सव न केवल हिंदुओं द्वारा बल्कि उस समय के अन्य समुदायों द्वारा भी हर्षोल्लास से मनाया जाता था।” 2. आयुर्वेद का सिद्धांत: “वसंत ऋतु में कफ दोष बढ़ जाता है, जिसे होली के उमंग और प्राकृतिक रंगों द्वारा संतुलित किया जा सकता है।” होली के विविध रूप: भारतीय संस्कृति की इंद्रधनुषी झलक मेरा मानना है कि भारत का हर कोना होली को अपने तरीके से जीता है। जब मैंने अलग-अलग स्थानों की होली का अध्ययन किया, तो मुझे एहसास हुआ कि हर परंपरा के पीछे एक गहरा भाव और विज्ञान छिपा है: मेरी यात्रा और आपका सफर अंत में, मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि होली वह समय है जब हम प्रकृति के साथ दोबारा तालमेल बिठाते हैं। यह केवल एक कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि अपनी पुरानी आदतों (Negative patterns) को ‘होलिका’ में जलाकर, नए उत्साह के साथ वसंत का स्वागत करने का पर्व है। मेरा मानना है कि अगर हम इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें, तो यह त्यौहार हमें साल भर की ऊर्जा (Energy) दे सकता है।

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नासदीय सूक्त का रहस्य: बिग बैंग से पहले क्या था?

जब आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड की उत्पत्ति की बात करता है, तो वह अक्सर हमें बिग बैंग की ओर ले जाता है—एक ऐसा क्षण जहाँ समय, स्थान और पदार्थ एक अत्यंत सघन बिंदु से फूट पड़े। लेकिन इस सिद्धांत के ठीक पहले क्या था? इस प्रश्न पर आते ही आधुनिक भौतिकी भी मौन हो जाती है। आश्चर्यजनक रूप से, यही मौन हमें हज़ारों वर्ष पहले रचे गए ऋग्वेद के एक अद्भुत मंत्र में भी मिलता है—नासदीय सूक्त (10.129)।https://www.sacred-texts.com/hin/rigveda/rv10129.htm यह सूक्त किसी ईश्वर, सृष्टिकर्ता या निश्चित उत्तर की घोषणा नहीं करता। बल्कि यह सवाल करता है, संदेह करता है और अंततः स्वीकार करता है कि शायद कोई भी—यहाँ तक कि देवता भी—इस रहस्य को पूरी तरह नहीं जानते। समय से पहले का शून्य: जब कुछ भी नहीं था अधिकांश सृजन कथाएँ हमें सांत्वना देती हैं। वे कहती हैं कि “ईश्वर ने कहा” और संसार बन गया। लेकिन नासदीय सूक्त हमें असहज करता है। इसकी शुरुआत ही एक विचलित करने वाले कथन से होती है—उस समय न तो अस्तित्व था, न ही अनस्तित्व। यह कथन साधारण नहीं है। यह भाषा की सीमाओं को तोड़ता है। “न होना” भी एक प्रकार का होना है, लेकिन यहाँ तो दोनों का निषेध है। आधुनिक भौतिकी में इसे हम pre-spacetime state कह सकते हैं—एक ऐसी अवस्था जहाँ न समय था, न स्थान, न कारण और न ही परिणाम।https://science.nasa.gov/universe/origin-evolution/big-bang/ आज 2026 तक भी, ब्रह्मांड विज्ञान इस प्रश्न पर अटक जाता है कि बिग बैंग से पहले क्या था, क्योंकि “पहले” शब्द ही समय की उपस्थिति मान लेता है। नासदीय सूक्त इस उलझन को पहले ही पहचान चुका था। भाषा का विरोधाभास और वास्तविकता की सीमा “न तो सत था, न असत”—यह पंक्ति केवल काव्य नहीं है। यह एक दार्शनिक विस्फोट है। यह बताती है कि मानव भाषा वास्तविकता को पूरी तरह पकड़ने में अक्षम है। यही बात आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि क्वांटम स्तर पर हमारी गणितीय भाषा भी लड़खड़ा जाती है। इस सूक्त में कोई दावा नहीं, कोई घोषणा नहीं—केवल प्रश्न हैं। यह दृष्टिकोण आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से मेल खाता है, जहाँ अंतिम सत्य का दावा करने के बजाय निरंतर संदेह को महत्व दिया जाता है। स्वर्ण बीज और सिंगुलैरिटी: हिरण्यगर्भ की अवधारणा नासदीय सूक्त और वैदिक साहित्य में हिरण्यगर्भ का उल्लेख मिलता है—एक स्वर्णिम बीज, जिससे सृष्टि का विस्तार हुआ। आधुनिक भौतिकी में, बिग बैंग को भी एक gravitational singularity के रूप में समझा जाता है—असीम घनत्व और तापमान का एक बिंदु। यह समानता केवल प्रतीकात्मक नहीं है। दोनों ही अवस्थाएँ ऐसी हैं जहाँ हमारे नियम टूट जाते हैं। हिरण्यगर्भ कोई देवता नहीं, बल्कि एक संभावना है—एक सुप्त अवस्था, जिसमें सब कुछ समाया हुआ है लेकिन कुछ भी प्रकट नहीं। तपस: वह ऊर्जा जिसने शून्य को हिला दिया सूक्त में कहा गया है कि सृष्टि से पहले “तपस” उत्पन्न हुआ। तपस को अक्सर तपस्या कहा जाता है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ है—आंतरिक ऊष्मा, ऊर्जा, तनाव। आधुनिक विज्ञान में, बिग बैंग से ठीक पहले या उसके दौरान ऊर्जा का तीव्र विस्फोट हुआ, जिसने ब्रह्मांड का विस्तार शुरू किया। यह विस्तार केवल भौतिक नहीं था, बल्कि नियमों का भी था—कण, बल, समय, सब कुछ वहीं जन्मा। तपस और ऊर्जा—दोनों ही निष्क्रिय अवस्था से सक्रिय अवस्था में परिवर्तन का संकेत हैं। काम: पहला कंपन, पहला इरादा नासदीय सूक्त कहता है कि सृष्टि की शुरुआत “काम” से हुई—इच्छा से। यह कोई भावनात्मक इच्छा नहीं, बल्कि पहला कंपन, पहली गति है। क्वांटम भौतिकी में, शून्य पूर्णतः स्थिर नहीं होता। वहाँ निरंतर quantum fluctuations होती रहती हैं—अचानक उत्पन्न होने वाले कण और ऊर्जा। यह संभावना कि ब्रह्मांड एक आकस्मिक क्वांटम घटना से जन्मा हो, आज गंभीरता से ली जाती है। काम और fluctuation—दोनों ही बिना कारण के आंदोलन का संकेत देते हैं। जल का प्रतीक: द्रव नहीं, संभावना सूक्त में “जल” का उल्लेख है, लेकिन यह भौतिक जल नहीं है। यह एक fluid-like अवस्था का प्रतीक है—जहाँ सब कुछ अनिश्चित, प्रवाही और अस्थिर है। आज वैज्ञानिक क्वांटम वैक्यूम को भी कुछ इसी तरह वर्णित करते हैं—एक ऐसा क्षेत्र जो खाली दिखता है, लेकिन ऊर्जा से भरा होता है। यह समानता इस बात का संकेत है कि प्राचीन ऋषि भौतिक वस्तुओं से अधिक अवस्थाओं की बात कर रहे थे। ऋषियों की महान शंका: क्या देवता भी नहीं जानते? नासदीय सूक्त का सबसे क्रांतिकारी भाग इसका अंत है। यह कहता है कि शायद सृष्टि का रहस्य वह भी नहीं जानता, जो सबसे ऊपर बैठा है। यह कथन किसी भी धार्मिक ग्रंथ में दुर्लभ है। यहाँ ईश्वर सर्वज्ञ नहीं, बल्कि प्रश्नों के दायरे में है।…

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