भूमिका: तंत्र क्या है?
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में तंत्र कोई रहस्यमय, भयावह या वर्जित पंथ नहीं है, जैसा कि आधुनिक समय में प्रायः समझा जाता है। तंत्र मूलतः जीवन को पूर्णता में स्वीकार करने और चेतना के विस्तार का विज्ञान है। वेद, उपनिषद, योग और सांख्य की तरह तंत्र भी आत्म-उद्धार का एक स्वतंत्र और अत्यंत व्यावहारिक मार्ग है। जहाँ वेद कर्म पर बल देते हैं, उपनिषद ज्ञान पर और योग अनुशासन पर, वहीं तंत्र ऊर्जा (शक्ति) और अनुभव पर आधारित साधना-पद्धति है।
संस्कृत में तन् धातु का अर्थ है “विस्तार करना” और त्र का अर्थ है “उपकरण”। इस प्रकार तंत्र वह विधा है जो चेतना के विस्तार का उपकरण प्रदान करती है। तंत्र जीवन को त्यागने नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष—शरीर, मन, भाव, इंद्रियाँ और प्रकृति—को साधना में रूपांतरित करने की शिक्षा देता है।
शास्त्रीय परिभाषा: तंत्र की परिभाषा शास्त्रों में
तंत्र क्या है? तंत्र की प्रामाणिक समझ के लिए शास्त्रीय संदर्भ अत्यंत आवश्यक हैं। निम्नलिखित ग्रंथों में तंत्र की स्पष्ट परिभाषाएँ मिलती हैं:
1. कुलार्णव तंत्र में कहा गया है:
“तनोति विपुलान अर्थान् तत्त्वज्ञानसमन्वितान्।
त्रायते च महाभीतात् तस्मात् तंत्रमिति स्मृतम्॥”
अर्थात्—जो साधक को तत्त्वज्ञान द्वारा जीवन के गूढ़ अर्थों का विस्तार देता है और महान भय (अज्ञान) से रक्षा करता है, वही तंत्र कहलाता है।
2. महा निर्वाण तंत्र के अनुसार:
“तत्त्वज्ञानप्रधानं यत् साधनं मोक्षसाधकम्।
तदेव तंत्रमार्गः स्यात् न केवलं क्रियात्मकम्॥”
अर्थ—तंत्र केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान से युक्त वह साधना है जो मोक्ष का साधन बनती है।
3. शिव संहिता में शिव स्वयं कहते हैं:
“तंत्रं नास्ति परं ज्ञानं तंत्रं नास्ति परा क्रिया।
तस्मात् तंत्रं समासाद्य सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥”
अर्थ—तंत्र से श्रेष्ठ न कोई ज्ञान है, न कोई क्रिया; तंत्र का आश्रय लेकर ही मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि तंत्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत, वैज्ञानिक और अनुभवप्रधान साधना-पथ है।
तंत्र का दार्शनिक आधार
तंत्र का मूल दर्शन अद्वैत है। तंत्र के अनुसार शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) अलग नहीं हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड शक्ति का ही विस्तार है और वही शक्ति साधक के भीतर कुंडलिनी के रूप में विद्यमान है। तंत्र कहता है कि जिस शरीर को हम बंधन समझते हैं, वही मुक्ति का साधन भी बन सकता है तंत्र।
तंत्र में संसार को माया कहकर नकारा नहीं गया, बल्कि उसे दिव्य अभिव्यक्ति माना गया है। स्त्री को शक्ति रूप में, प्रकृति को देवी रूप में और शरीर को मंदिर के रूप में देखा गया है। यही कारण है कि तंत्र स्त्री-सम्मान, प्रकृति-संरक्षण और जीवन-स्वीकृति का सबसे प्राचीन दर्शन है।
तंत्र साधना कौन करता है?
परंपरागत रूप से तंत्र साधना राजाओं, गृहस्थों, ऋषियों, वीरों और सामान्य जन—सभी द्वारा की जाती रही है। यह केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं रही। बंगाल, कश्मीर, कामरूप (असम), ओडिशा और नेपाल में गृहस्थ तांत्रिक परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है।तंत्र क्या है ?
तंत्र का मूल सिद्धांत है—अधिकार भेद। अर्थात् साधक की मानसिक स्थिति, संस्कार, उद्देश्य और गुरु-कृपा के अनुसार साधना का चयन किया जाता है।
तंत्र की प्रासंगिकता और महत्व
आधुनिक जीवन में तनाव, भय, असंतुलन और उद्देश्यहीनता बढ़ती जा रही है। तंत्र साधना व्यक्ति को आंतरिक शक्ति, मानसिक स्थिरता और जीवन-ऊर्जा प्रदान करती है। यह केवल मोक्ष का नहीं, बल्कि एक संतुलित, सशक्त और जागरूक जीवन का मार्ग है।
तंत्र व्यक्ति को सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा ही जीवन की दिशा तय करती है।
तंत्र साधना कौन कर सकता है?
तंत्र किसी जाति, लिंग या आश्रम से बंधा नहीं है। एक शुद्ध आचरण वाला, अनुशासित और गुरु-मार्गदर्शन में चलने वाला कोई भी व्यक्ति तंत्र साधना कर सकता है। विशेष रूप से गृहस्थों के लिए तंत्र अत्यंत उपयोगी माना गया है, क्योंकि यह संसार में रहते हुए आत्मिक उन्नति का मार्ग देता है।
तंत्र साधना के प्रकार
तंत्र साधना को यदि केवल किसी एक विधि, क्रिया या परंपरा तक सीमित कर दिया जाए, तो यह तंत्र के व्यापक और समग्र स्वरूप के साथ अन्याय होगा। तंत्र मूलतः चेतना-विकास का विज्ञान है और इसीलिए यह मानता है कि प्रत्येक साधक की मानसिक संरचना, संस्कार, भय, आकांक्षाएँ और जीवन-स्थितियाँ भिन्न होती हैं। इसी कारण तंत्र शास्त्रों में साधना के अनेक प्रकार बताए गए हैं, ताकि साधक अपने स्वभाव और क्षमता के अनुसार उपयुक्त मार्ग का चयन कर सके। तंत्र का यह लचीलापन ही इसे अन्य साधना-पद्धतियों से अलग और अधिक व्यावहारिक बनाता है।
शास्त्रीय परंपरा में तंत्र साधना के तीन मुख्य मार्ग माने गए हैं—दक्षिणाचार, वामाचार और मध्यमाचार तंत्र क्या है। दक्षिणाचार तंत्र सबसे अधिक प्रचलित, सुरक्षित और सामाजिक रूप से स्वीकार्य मार्ग है। इसमें साधना का आधार सात्त्विक आचरण, मंत्र-जप, ध्यान, यंत्र-पूजन, न्यास, देव-उपासना और आत्मशुद्धि होता है। इस मार्ग में बाह्य और आंतरिक शुद्धता पर विशेष बल दिया जाता है। अधिकांश गृहस्थ, विद्यार्थी और सामान्य साधक इसी मार्ग से तंत्र साधना प्रारंभ करते हैं, क्योंकि यह जीवन के दायित्वों के साथ संतुलन बनाए रखता है और साधक को धीरे-धीरे भीतर से परिपक्व बनाता है।
वामाचार तंत्र को लेकर समाज में सर्वाधिक भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। वास्तविकता यह है कि वामाचार तंत्र क्ई उच्छृंखल या अनैतिक मार्ग नहीं, बल्कि अत्यंत गूढ़ और नियंत्रित साधना-पद्धति है। इसका उद्देश्य साधक को भय, वासना, द्वैत और अहंकार जैसे गहरे मानसिक बंधनों से मुक्त करना होता है। यह तंत्र मार्ग केवल उन्हीं साधकों के लिए बताया गया है जो दीर्घकालीन साधना, कठोर अनुशासन और पूर्ण गुरु-नियंत्रण में हों। शास्त्र स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि तंत्र बिना अधिकार, पात्रता और मार्गदर्शन के वामाचार का प्रयोग आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है।
मध्यमाचार इन दोनों के बीच का संतुलित मार्ग है, जिसमें साधक न तो कठोर वैराग्य अपनाता है और न ही उग्र प्रयोगों की ओर जाता है। इसमें जीवन की सामान्य गतिविधियाँ—कार्य, परिवार, समाज—सभी साधना का ही अंग बन जाती हैं। इसके अतिरिक्त तंत्र के अंतर्गत मंत्र तंत्र, यंत्र तंत्र, कुंडलिनी जागरण, श्रीविद्या साधना, भैरव साधना और शक्ति साधना जैसे अनेक उप-मार्ग भी आते हैं। ये सभी साधक की आंतरिक तैयारी और उद्देश्य के अनुसार अपनाए जाते हैं। इस प्रकार तंत्र साधना कोई सीमित विधि नहीं, बल्कि चेतना-विकास की एक बहुआयामी और गहन प्रक्रिया है।
“तंत्र शास्त्रों की शास्त्रीय व्याख्या”https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/introduction-to-tantra
गृहस्थ के लिए तंत्र साधना
तंत्र शास्त्रों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अक्सर उपेक्षित विशेषता यह है कि तंत्र साधना को मूलतः गृहस्थ जीवन के लिए अत्यंत अनुकूल और प्रभावी मार्ग माना गया है। सामान्य धारणा के विपरीत, तंत्र कभी भी यह नहीं कहता कि आत्मिक उन्नति के लिए परिवार, समाज या कर्तव्यों का त्याग आवश्यक है। तंत्र का दर्शन स्पष्ट है—जो व्यक्ति जीवन के मध्य में खड़े होकर चेतना को जाग्रत कर सकता है, वही वास्तविक साधक है।
गृहस्थ के लिए तंत्र साधना का उद्देश्य किसी प्रकार की चमत्कारी शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, सुरक्षा, मानसिक स्थिरता, भावनात्मक परिपक्वता और आध्यात्मिक जागरूकता लाना है। इसलिए गृहस्थ तंत्र साधना सदैव सात्त्विक, मर्यादित और अनुशासित होती है। इसमें दैनिक मंत्र-जप, ईष्ट देव की उपासना, दीप-धूप, ध्यान, स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण को प्रमुख स्थान दिया गया है। तंत्र कहता है कि यदि गृहस्थ अपने घर को ही साधना-स्थल बना ले, तो वही स्थान तीर्थ बन जाता है।

गृहस्थ साधकों के लिए विशेष रूप से गणपति तंत्र, शिव उपासना, दुर्गा साधना और श्रीविद्या परंपरा को अत्यंत उपयुक्त माना गया है। गणपति विघ्नों का नाश कर साधना को स्थिर बनाते हैं, शिव आंतरिक शांति और वैराग्य प्रदान करते हैं, दुर्गा साधक को बाहरी और आंतरिक नकारात्मक शक्तियों से संरक्षण देती हैं, जबकि श्रीविद्या साधना जीवन में सौंदर्य, संतुलन और ब्रह्मानंद का अनुभव कराती है। ये सभी साधनाएँ गृहस्थ के सामाजिक और पारिवारिक जीवन को नष्ट नहीं करतीं, बल्कि उसे और अधिक सशक्त बनाती हैं।
महत्वपूर्ण यह है कि गृहस्थ तांत्रिक को अपने आचार-विचार में विशेष सजगता रखनी चाहिए। सत्य, संयम, करुणा, जिम्मेदारी और विनम्रता—ये गृहस्थ साधक के वास्तविक आभूषण हैं। तंत्र साधना गृहस्थ को समाज से अलग नहीं करती, बल्कि उसे एक जागरूक, संतुलित और उत्तरदायी व्यक्ति में रूपांतरित करती है, जो भीतर से शांत और बाहर से कर्तव्यनिष्ठ होता है।
तंत्र में पूज्य देवता
तंत्र परंपरा में देवताओं की अवधारणा अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है। यहाँ देवता केवल बाहरी आराध्य या वरदान देने वाली शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वे चेतना और ऊर्जा के विशिष्ट तत्त्वों के प्रतीक माने जाते हैं। प्रत्येक तांत्रिक देवता साधक के भीतर विद्यमान किसी न किसी सूक्ष्म शक्ति-केंद्र, मानसिक अवस्था या चेतना-स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए तंत्र में देव-उपासना वास्तव में आत्म-उपासना का ही एक रूप है।
तंत्र में सर्वप्रमुख स्थान महादेव को प्राप्त है, विशेष रूप से उनके भैरव स्वरूप में। भैरव को तंत्र मार्ग का रक्षक और नियंत्रक माना गया है। वे भय, अज्ञान और अहंकार का नाश करते हैं तथा साधक को साधना-पथ पर सुरक्षित रखते हैं। शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया है कि भैरव की अनुकंपा के बिना तंत्र साधना अपूर्ण रहती है।
इसी प्रकार माँ काली तंत्र की मूल शक्ति मानी जाती हैं। वे काल, मृत्यु, भय और अज्ञान का प्रतीकात्मक संहार करती हैं और साधक को सत्य के साक्षात्कार की ओर ले जाती हैं। काली साधना का उद्देश्य विनाश नहीं, बल्कि आंतरिक बंधनों का अंत है। त्रिपुरसुंदरी (श्रीललिता) श्रीविद्या परंपरा की अधिष्ठात्री देवी हैं और उन्हें तंत्र का सबसे सूक्ष्म, सात्त्विक और उच्च स्वरूप माना गया है। वे सौंदर्य, करुणा, संतुलन और ब्रह्मानंद की प्रतीक हैं।
माँ दुर्गा शक्ति का वह स्वरूप हैं जो साधक को बाहरी और आंतरिक नकारात्मक शक्तियों से संरक्षण देती हैं। इसके अतिरिक्त तारा, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी जैसी महाविद्याएँ तंत्र के विभिन्न आयामों—ज्ञान, वाणी, निर्भीकता, नियंत्रण और रूपांतरण—का प्रतिनिधित्व करती हैं। गृहस्थ साधकों के लिए विशेष रूप से गणपति की उपासना को अत्यंत सुरक्षित और आवश्यक माना गया है, क्योंकि वे साधना में आने वाले विघ्नों को दूर कर मार्ग को सुगम बनाते हैं।
https://belurmath.org: तंत्र का समग्र परिचय: दर्शन, साधना और आधुनिक प्रासंगिकताइस प्रकार तंत्र में देवता-पूजा का उद्देश्य किसी बाहरी शक्ति से भयभीत होना नहीं, बल्कि साधक के भीतर सुप्त चेतना-शक्ति को जाग्रत करना है। देवता यहाँ मार्गदर्शक हैं, लक्ष्य नहीं—और यही तंत्र की सबसे गहन और सकारात्मक शिक्षा है।
तंत्र से जुड़े मिथक और भ्रांतियाँ
तंत्र को केवल श्मशान, तामसिक क्रियाओं और भय से जोड़ना एक गहरी भ्रांति है। वास्तविक तंत्र साधना अत्यंत शुद्ध, अनुशासित और करुणामय होती है। गलत प्रस्तुतियों और अधूरे ज्ञान ने इसकी छवि को विकृत किया है।
आज तंत्र इतना लोकप्रिय क्यों हो रहा है?
इक्कीसवीं सदी में तंत्र की ओर बढ़ता आकर्षण कोई संयोग नहीं है। यह उस गहरे मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संकट का परिणाम है, जिससे आधुनिक मानव गुजर रहा है। भौतिक प्रगति, तकनीकी सुविधा और उपभोक्तावाद ने जीवन को आरामदायक तो बनाया, लेकिन अर्थहीन, तनावपूर्ण और असंतुलित भी कर दिया। आज का मनुष्य बाहरी सफलता के बावजूद भीतर से खाली, भयग्रस्त और उद्देश्यविहीन अनुभव कर रहा है। ऐसे समय में तंत्र एक ऐसे मार्ग के रूप में उभरता है जो सीधा अनुभव, आंतरिक शक्ति और व्यक्तिगत रूपांतरण की बात करता है।
पहला कारण है—अनुभव की खोज। आधुनिक व्यक्ति केवल विश्वास या परंपरा के आधार पर कुछ स्वीकार नहीं करना चाहता, वह स्वयं अनुभव करना चाहता है। तंत्र शास्त्र कहता है कि सत्य को जानने के लिए उसे जिया जाना चाहिए। मंत्र, ध्यान, न्यास और ऊर्जा-साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर परिवर्तन को प्रत्यक्ष अनुभव करता है, जो उसे इस मार्ग की ओर आकर्षित करता है।
दूसरा बड़ा कारण है—ऊर्जा विज्ञान में आधुनिक रुचि। आज क्वांटम फिज़िक्स, न्यूरोसाइंस और कॉन्शसनेस स्टडीज़ यह स्वीकार कर रही हैं कि ब्रह्मांड ऊर्जा और चेतना से निर्मित है। तंत्र हजारों वर्ष पहले ही यह कह चुका है कि संपूर्ण सृष्टि शक्ति का विस्तार है और मनुष्य उसी शक्ति का सूक्ष्म रूप है। यह साम्य आधुनिक शिक्षित वर्ग को तंत्र की ओर पुनः उन्मुख कर रहा है।
तीसरा कारण है—स्त्री शक्ति और शक्ति उपासना का पुनरुत्थान। आज समाज में स्त्री, प्रकृति और शक्ति के महत्व पर फिर से चर्चा हो रही है। तंत्र वह एकमात्र भारतीय दर्शन है जिसने शक्ति को ब्रह्म के समकक्ष रखा, देवी को केंद्र में स्थापित किया और स्त्री को पूज्य माना। इस कारण विशेष रूप से युवा पीढ़ी और शोधकर्ता तंत्र को नए दृष्टिकोण से समझना चाह रहे हैं।
चौथा कारण है—मानसिक स्वास्थ्य संकट। डिप्रेशन, एंग्जायटी और आत्मिक अस्थिरता आज वैश्विक समस्या बन चुकी है। तंत्र साधना मन, प्राण और चेतना को संतुलित करने की वैज्ञानिक विधियाँ प्रदान करती है। इसलिए लोग इसे केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक उपचार के मार्ग के रूप में भी देखने लगे हैं।
अंततः, सोशल मीडिया और अधूरे ज्ञान के कारण फैले भय और रहस्य ने भी जिज्ञासा को जन्म दिया है। लेकिन जैसे-जैसे प्रामाणिक गुरु, शास्त्र और शोध सामने आ रहे हैं, लोग तंत्र के वास्तविक, सात्त्विक और सकारात्मक स्वरूप को समझने लगे हैं। यही कारण है कि आज तंत्र फिर से चर्चा के केंद्र में है।
तंत्र साधना की शुरुआत कैसे करें?
तंत्र साधना की शुरुआत कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि आंतरिक पुकार और परिपक्वता का परिणाम होती है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि तंत्र मार्ग में प्रवेश भय, जिज्ञासा या चमत्कार-लालसा से नहीं, बल्कि शुद्ध उद्देश्य और आत्मिक विकास की भावना से करना चाहिए। इसलिए आरंभ से पहले मानसिक तैयारी सबसे आवश्यक है।
सबसे पहला चरण है—दृष्टिकोण की शुद्धि। तंत्र को किसी शक्ति-प्रदर्शन, वशीकरण या त्वरित लाभ की विधि समझना सबसे बड़ी भूल है। साधक को यह स्पष्ट होना चाहिए कि तंत्र आत्म-परिवर्तन, चेतना-विस्तार और जीवन-संतुलन का मार्ग है। जब उद्देश्य शुद्ध होता है, तभी साधना सुरक्षित और फलदायी बनती है।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण है—गुरु का महत्व। तंत्र शास्त्रों में कहा गया है कि बिना गुरु के तंत्र साधना अंधकार में प्रवेश करने के समान है। गुरु केवल मंत्र देने वाला नहीं, बल्कि साधक की मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को समझकर मार्गदर्शन करने वाला होता है। प्रारंभिक अवस्था में यदि प्रत्यक्ष गुरु न भी मिले, तो शास्त्रसम्मत ग्रंथों को ही गुरु-भाव से पढ़ना चाहिए।
तीसरा चरण है—सात्त्विक साधना से आरंभ। गृहस्थ या प्रारंभिक साधक को कभी भी उग्र या रहस्यमय प्रयोगों की ओर नहीं जाना चाहिए। गणपति मंत्र जप, शिव पंचाक्षरी मंत्र, दुर्गा सप्तशती के चयनित मंत्र, या श्रीविद्या के सरल मंत्र—ये सभी सुरक्षित और प्रभावी प्रारंभिक साधन हैं।
चौथा चरण है—नियम और अनुशासन। तंत्र साधना में समय, स्थान और पवित्रता का विशेष महत्व है। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर, स्वच्छ स्थान में, शांत मन से जप या ध्यान करना साधना को स्थिर करता है। अल्प साधना भी यदि नियमित हो, तो वह गहरी सिद्धि का कारण बनती है।
पाँचवाँ चरण है—संयम और संतुलन। तंत्र जीवन-विरोधी नहीं है, लेकिन अराजक भी नहीं। आहार, विचार, व्यवहार और संगति—इन सभी में संतुलन आवश्यक है। तंत्र साधना करते हुए व्यक्ति को अधिक विनम्र, करुणामय और जिम्मेदार बनना चाहिए, न कि अहंकारी।
अंततः, तंत्र साधना में धैर्य सबसे बड़ा गुण है। यह कोई त्वरित परिणाम देने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि धीरे-धीरे भीतर घटने वाला रूपांतरण है। जब साधक परिणाम छोड़कर साधना में रम जाता है, तभी तंत्र अपना वास्तविक रहस्य प्रकट करता है।
तंत्र को समझने के लिए प्रमुख ग्रंथ
तंत्र अध्ययन के लिए कुलार्णव तंत्र, महा निर्वाण तंत्र, शिव संहिता, योगिनी हृदय, तंत्रलोक और शारदा तिलक तंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
निष्कर्ष: तंत्र क्या है? तंत्र — भय नहीं, बोध का मार्ग
तंत्र कोई अंधकार नहीं, बल्कि प्रकाश का विज्ञान है। यह जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के माध्यम से मोक्ष का मार्ग दिखाता है। यदि सही दृष्टि, शुद्ध उद्देश्य और गुरु-कृपा हो, तो तंत्र साधना व्यक्ति को भीतर से रूपांतरित कर सकती है।
तंत्र हमें सिखाता है कि शक्ति बाहर नहीं, भीतर है — और उसी शक्ति की जागृति ही जीवन का परम उद्देश्य है।“तंत्र परंपरा को समझने के लिए आधुनिक शोध और शास्त्रीय संदर्भ दोनों आवश्यक हैं, जिनका समन्वय हमें प्रामाणिक स्रोतों में मिलता है।”
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लेखक: दीपक कुमार मिश्रा





