CRISPR: जीन एडिटिंग की क्रांतिकारी तकनीक (The Revolutionary Technology of Gene Editing)

I. प्रस्तावना: CRISPR क्या है? (Introduction: What is CRISPR?)

परिभाषा: CRISPR जीन एडिटिंग (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats) एक क्रांतिकारी जीन एडिटिंग तकनीक है जो वैज्ञानिकों को आनुवंशिक सामग्री (DNA) को अत्यंत सटीकता से बदलने, हटाने या जोड़ने की अनुमति देती है। यह एक ऐसी जैविक प्रणाली है जिसे बैक्टीरिया ने लाखों वर्षों में विकसित किया है, और जिसे अब मानव प्रौद्योगिकी के लिए अनुकूलित (adapted) किया गया है। इसे अक्सर “आणविक कैंची” (Molecular Scissors) कहा जाता है, क्योंकि यह DNA की दोहरी लड़ी को किसी भी वांछित स्थान पर काटने में सक्षम है।

सरल व्याख्या: इस तकनीक की कल्पना एक ऐसे ‘सर्च और रिप्लेस’ (Search and Replace) फंक्शन के रूप में की जा सकती है जो कंप्यूटर प्रोग्राम में कोड बदलने जैसा है, लेकिन यह क्रिया जीवित कोशिकाओं के अंदर, उनके मूल DNA में की जाती है। यह हमें जीवन के मूल ब्लूप्रिंट को फिर से लिखने की शक्ति देती है।

प्रौद्योगिकी का महत्त्व: CRISPR ने आनुवंशिक अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसकी सटीकता, गति, और कम लागत के कारण, इसके अनुप्रयोग चिकित्सा, कृषि और जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के क्षेत्र में अभूतपूर्व संभावनाएँ पैदा करते हैं, जिसमें लाइलाज बीमारियों का स्थायी इलाज और खाद्य सुरक्षा में सुधार शामिल है।

II. इतिहास और आविष्कार (History and Invention) – कौन और कब?

A. CRISPR की शुरुआत (The Start of CRISPR)

1987: CRISPR की कहानी की शुरुआत तब हुई जब जापान के वैज्ञानिक योशिजुमी इशिन्ो (Yoshizumi Ishino) ने जीवाणु (ई. कोलाई, E. coli) के जीनोम में पहली बार CRISPR जैसे दोहराए जाने वाले DNA अनुक्रमों (Repeated DNA Sequences) की खोज की। उस समय, उन्हें यह नहीं पता था कि ये अजीबोगरीब सीक्वेंस क्या करते हैं और इनका क्या जैविक कार्य है।

2005: वर्षों बाद, फ्रांस के फ्रांसिस्को मोजीका (Francisco Mojica) ने सिद्ध किया कि ये CRISPR सीक्वेंस वास्तव में बैक्टीरिया के अनुकूली प्रतिरक्षा तंत्र (Adaptive Immune System) का एक अभिन्न हिस्सा हैं। ये सीक्वेंस अनिवार्य रूप से पुराने वायरल हमलों की याददाश्त के रूप में कार्य करते हैं, जिससे बैक्टीरिया भविष्य में समान वायरसों से बचाव कर सकता है। मोजीका ने ही सबसे पहले सुझाव दिया कि CRISPR एक रक्षात्मक उपकरण है।

B. ‘आविष्कारक’ और प्रमुख सफलता (The ‘Inventors’ and Major Breakthrough)

2012 (The Breakthrough Year): CRISPR को एक एडिटिंग टूल के रूप में बदलने का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कदम इसी वर्ष उठाया गया।

वैज्ञानिक: यह सफलता मुख्य रूप से जेनिफर डोडना (Jennifer Doudna) (कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले) और इमैनुएल चारपेंटियर (Emmanuelle Charpentier) (तब स्वीडन में) के संयुक्त प्रयास से मिली।

सफलता: डोडना और चारपेंटियर ने दिखाया कि Cas9 (CRISPR-associated protein 9) नामक एंजाइम के साथ CRISPR को जोड़कर, इसे एक प्रोग्रामेबल टूल में बदला जा सकता है। इसका मतलब है कि इसे किसी भी जीव के DNA को किसी भी वांछित स्थान पर काटने के लिए निर्देशित किया जा सकता है। यह खोज जीन एडिटिंग के लिए एक सटीक, तेज और सस्ता तरीका साबित हुई।

CRISPER जेनिफर डोडना

नोबेल पुरस्कार: 2020 में, उन्हें इस अभूतपूर्व कार्य के लिए रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि जीन एडिटिंग विज्ञान और मानवता के लिए कितनी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। https://www.nobelprize.org/prizes/chemistry/2020/summary/

III. CRISPR की कार्यप्रणाली और जटिलता (Mechanism and Complexity)

A. उपकरण: Cas9 और गाइड RNA (The Tools: Cas9 and Guide RNA)

Cas9 प्रोटीन: यह वह मुख्य “कैंची” है जो DNA को काटती है। Cas9 वास्तव में एक न्यूक्लियेज एंजाइम (Nuclease Enzyme) है जो DNA की फॉस्फोडिएस्टर बैकबोन को तोड़ने की क्षमता रखता है। https://www.addgene.org/guides/crispr/

गाइड RNA (gRNA): यह वह “डाक कोड” या नेविगेटर है जो Cas9 प्रोटीन को DNA में लक्षित स्थान (Target Location) तक मार्गदर्शन करता है। gRNA लगभग 20 न्यूक्लियोटाइड लंबा होता है। यह लक्षित DNA अनुक्रम के पूरक (complementary) के रूप में डिज़ाइन किया जाता है।

क्रियाविधि: gRNA और Cas9 एक साथ एक कॉम्प्लेक्स बनाते हैं। यह कॉम्प्लेक्स कोशिका के केंद्रक (Nucleus) में प्रवेश करता है। gRNA, DNA के लंबे स्ट्रैंड को स्कैन करता है। जैसे ही gRNA लक्षित DNA अनुक्रम को पहचानता है और उससे जुड़ता है, Cas9 को सक्रिय होने का निर्देश मिलता है, और यह ठीक उसी स्थान पर DNA की दोनों लड़ियों (डबल-स्ट्रैंड ब्रेक) को काट देता है।

B. संपादन की जटिलता (Complexity in Editing)

DNA कटने के बाद, कोशिका इसे जीवन-रक्षक प्रतिक्रिया के रूप में तुरंत ठीक करने की कोशिश करती है। वैज्ञानिक इसी मरम्मत प्रक्रिया का उपयोग वांछित बदलाव लाने के लिए करते हैं।

1. NHEJ (Non-Homologous End Joining): यह कोशिका द्वारा DNA को जोड़ने का सबसे आम और त्रुटि-प्रवण (error-prone) तरीका है। इस प्रक्रिया में, कोशिका टूटे हुए सिरों को बस वापस एक साथ चिपका देती है, लेकिन अक्सर इस दौरान कुछ न्यूक्लियोटाइड खो जाते हैं या जुड़ जाते हैं, जिससे लक्षित जीन अक्षम (Inactivate) हो जाता है (जीन Knockout)।

2. HDR (Homology-Directed Repair): यह सटीक संपादन (Precise Editing) के लिए उपयोग किया जाने वाला तरीका है। इसमें, वैज्ञानिक कटे हुए स्थान के साथ मिलता-जुलता एक टेम्प्लेट DNA (Template DNA) कोशिका को प्रदान करते हैं। कोशिका इस टेम्प्लेट को गाइड के रूप में उपयोग करके कटे हुए स्थान की मरम्मत करती है, जिससे वैज्ञानिक द्वारा डाली गई नई जानकारी को DNA में सफलतापूर्वक जोड़ा जा सकता है।

IV. उपयोग के क्षेत्र और प्रमुख सफलताएँ (Applications and Major Breakthroughs)

CRISPR-Cas9 प्रणाली की सचित्र व्याख्या: DNA को काटने वाली आणविक कैंची Cas9

A. चिकित्सा और स्वास्थ्य (Medicine and Health)

क्षेत्रउपयोगिता (Utility)प्रमुख सफलता (Major Breakthrough)
आनुवंशिक रोगसिकल सेल एनीमिया (Sickle Cell Anemia), सिस्टिक फाइब्रोसिस और हंटिंगटन रोग जैसे एकल-जीन विकारों का स्थायी उपचार करने की क्षमता।CRISPR Therapeutics ने रक्त विकारों (Blood Disorders) जैसे सिकल सेल एनीमिया और बीटा थैलेसीमिया का सफल In Vivo (शरीर के अंदर) उपचार किया है, जिससे रोगियों को रोग-मुक्त जीवन मिला है।
कैंसर उपचारT-कोशिकाओं (T-Cells) को आनुवंशिक रूप से संपादित (एडिट) करके उन्हें कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए अधिक प्रभावी, स्मार्ट हथियार बनाना (जिसे CAR T-Cell Therapy में सुधार कहते हैं)।https://cancerfax.com/hi/crispr-and-gene-editing-revolutionizing-gene-therapy/कैंसर के इलाज के लिए CRISPR-आधारित नैदानिक परीक्षणों (Clinical Trials) की शुरुआत हुई है, जहाँ रोगी की T-कोशिकाओं को संपादित करके वापस शरीर में डाला जाता है।
वायरल रोगHIV और हर्पीस जैसे वायरसों के DNA को मानव जीनोम से लक्षित करके हटाना, जो लाइलाज बीमारियों का स्थायी समाधान हो सकता है।चूहों और अन्य जीवों में HIV के DNA को निष्क्रिय करने में सफलता मिली है, जिससे मनुष्यों में इलाज की उम्मीद जगी है।

B. कृषि और खाद्य सुरक्षा (Agriculture and Food Security)

बेहतर फसलें: CRISPR का उपयोग करके ऐसी फसलें बनाई जा सकती हैं जो सूखे, अत्यधिक गर्मी और विभिन्न कीटों के प्रति अधिक प्रतिरोधी (Resistant) हों, जिससे वैश्विक खाद्य उत्पादन सुरक्षित हो सके।

तेज विकास और पोषण: CRISPR पारंपरिक प्रजनन (Breeding) की तुलना में बहुत तेजी से अधिक उत्पादन और पोषक तत्वों वाली फसलें (जैसे: फफूंदी-प्रतिरोधी अंगूर, या अधिक विटामिन डी वाले टमाटर) विकसित कर सकती है।

पशुधन: पशुओं को सामान्य रोगों (जैसे स्वाइन फ्लू) से बचाने के लिए उनमें प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए मीथेन उत्सर्जन कम करने वाली पशु प्रजातियाँ विकसित करना।

V. उपलब्ध सुविधाएँ और प्रगति में अनुसंधान (Facilities Available and Research in Progress)

उपलब्ध सुविधाएँ (Facilities):

  • कई विश्वविद्यालय और निजी कंपनियाँ (जैसे Editas Medicine, Intellia Therapeutics) अब CRISPR-Cas9 और इसके उन्नत रूपों जैसे CRISPR-Cas12 एंजाइमों का उपयोग करके जीन एडिटिंग सेवाएँ प्रदान करती हैं, विशेष रूप से अनुसंधान और दवा विकास के लिए।
  • भारत में CSIR-IGIB (Institute of Genomics and Integrative Biology), CCMB (Centre for Cellular and Molecular Biology) और विभिन्न IITs जैसे संस्थान CRISPR अनुसंधान में अग्रणी हैं और छात्रों तथा शोधकर्ताओं को उन्नत सुविधाएँ प्रदान करते हैं।

प्रगति में अनुसंधान (Research in Progress):

  • बेस एडिटिंग (Base Editing): यह तकनीक DNA की दोनों लड़ियों को काटने से बचती है, जिससे त्रुटियों का खतरा कम होता है। यह केवल एक न्यूक्लियोटाइड (A, T, C, या G) को सीधे बदलकर वांछित म्यूटेशन को ठीक करती है।
  • प्राइम एडिटिंग (Prime Editing): इसे “सर्च एंड रिप्लेस” का सबसे सटीक रूप कहा जाता है। यह लंबी DNA स्ट्रैंड को हटा या बदल सकती है, जिससे जटिल आनुवंशिक म्यूटेशन को भी ठीक किया जा सकता है।
  • Cas13: वैज्ञानिक अब Cas13 जैसे एंजाइमों का उपयोग कर रहे हैं जो RNA (DNA नहीं) को लक्षित करते हैं। यह वायरल संक्रमणों के लिए अस्थायी और सुरक्षित उपचार विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

VI. चुनौतियाँ और जटिलताएँ (Challenges and Complexities)

चुनौती (Challenge)विवरण (Description)
ऑफ-टारगेट प्रभाव (Off-Target Effects)यह CRISPR के साथ सबसे बड़ी तकनीकी समस्या है। Cas9 प्रोटीन का अनजाने में DNA के गलत हिस्सों को काट देना (जहां लक्षित अनुक्रम से मिलती-जुलती संरचना हो) अनपेक्षित म्यूटेशन या गंभीर दुष्प्रभाव (Side Effects) पैदा कर सकता है।
वितरण (Delivery)Cas9/gRNA कॉम्प्लेक्स को शरीर के अंदर सही कोशिकाओं तक सुरक्षित रूप से पहुँचाना एक प्रमुख इंजीनियरिंग चुनौती है। इसके लिए अक्सर संशोधित वायरसों (Modified Viruses) या लिपिड नैनोपार्टिकल्स (Lipid Nanoparticles) का उपयोग किया जाता है, जिनकी अपनी सुरक्षा चिंताएँ हैं।
नैदानिक ​​लागत (Clinical Cost)ये जीन थेरेपी बहुत महंगी हैं। उच्च अनुसंधान और विकास लागत के कारण, ये उपचार विकासशील देशों में आम लोगों की पहुँच से बाहर हो जाते हैं, जिससे चिकित्सा समानता (Medical Equity) का मुद्दा पैदा होता है।

VII. नैतिक जोखिम और हानि (Ethical Risks and Loss to Use)

A. नैतिक जोखिम (Ethical Risks)

CRISPR-Cas9 प्रणाली की सचित्र व्याख्या: DNA को काटने वाली आणविक कैंची Cas9

जर्मलाइन एडिटिंग (Germline Editing): मानव भ्रूण, अंडे या शुक्राणु (Sperm) में आनुवंशिक परिवर्तन करना, जो अगली पीढ़ियों को विरासत में मिलेंगे। अधिकांश देशों ने इस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं क्योंकि इससे “डिजाइनर बच्चे” (Designer Babies) बनाने की संभावना पैदा होती है, जिससे गंभीर नैतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई है।

समानता (Equity): यदि यह तकनीक केवल धनी व्यक्तियों या विकसित देशों के लिए उपलब्ध है, तो यह स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन के मामले में असमानता (Inequality) को और गहरा कर सकती है, जिससे समाज में आनुवंशिक विभाजन हो सकता है।

B. अनपेक्षित हानि (Unintended Loss/Harm)

अज्ञात दीर्घकालिक प्रभाव: CRISPR-आधारित थेरेपी नई हैं। मानव जीनोम पर किए गए परिवर्तनों के दीर्घकालिक (Long-term) परिणाम अभी तक अज्ञात हैं, और पीढ़ियों तक इनका अध्ययन करना आवश्यक है।

पारिस्थितिकीय जोखिम (Ecological Risk): CRISPR का उपयोग करके बनाए गए जीवों (Genetically Modified Organisms – GMOs) का यदि अनियंत्रित रूप से पर्यावरण में प्रसार होता है, तो यह मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और जैव विविधता पर अप्रत्याशित नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

VIII. वैश्विक उपयोग और भारत में भविष्य (Global Use and Future in India)

A. वैश्विक उपयोग (Global Landscape)

संयुक्त राज्य अमेरिका: यह देश CRISPR अनुसंधान में वैश्विक नेतृत्व करता है, जिसमें सबसे अधिक नैदानिक ​​परीक्षण (Clinical Trials) चल रहे हैं और निजी कंपनियाँ अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं।

चीन: चीन अनुसंधान में सबसे तेज प्रगति के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से मानव भ्रूण एडिटिंग के विवादास्पद प्रयोगों के लिए, जिसने वैश्विक नियमों को सख्त करने की मांग उठाई है।

यूरोप: यूरोपीय संघ ने जर्मलाइन एडिटिंग और कुछ प्रकार के CRISPR-संपादित खाद्य पदार्थों पर सख्त नियामक ढाँचा (Stricter Regulatory Framework) और प्रतिबंध लागू किए हैं।

B. भारत में भविष्य और उपयोगिता (Future in India)

उपयोगिता: भारत में सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया और कुपोषण से संबंधित रोगों का बोझ अधिक है। CRISPR भारत के लिए एक गेम-चेंजर हो सकता है, क्योंकि यह इन रोगों का स्थायी और लागत प्रभावी समाधान प्रदान कर सकता है।https://www.youtube.com/watch?v=HGtQzhQJq4Y

सुविधाएँ और अनुसंधान: IGIB, CCMB जैसे भारतीय संस्थान सक्रिय रूप से CRISPR पर शोध कर रहे हैं, विशेष रूप से वायरल निदान (जैसे FELUDA CRISPR-आधारित COVID-19 टेस्ट) और कृषि फसलों में सुधार के लिए।

विनियामक ढाँचा (Regulatory Framework): भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) और नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए एक सख्त नियामक प्रक्रिया है (GEAC – Genetic Engineering Appraisal Committee), जो अनुसंधान और अनुप्रयोगों में सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

IX. निष्कर्ष (Conclusion)

CRISPR जीन एडिटिंग केवल एक उपकरण नहीं है; यह जैविक विज्ञान में एक मूलभूत बदलाव है। यह मानवता को बीमारियों को जड़ से खत्म करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने की अभूतपूर्व शक्ति देता है। हालांकि इसके साथ बड़े नैतिक और सुरक्षा जोखिम जुड़े हैं, विशेष रूप से जर्मलाइन एडिटिंग के संबंध में, लेकिन इसकी क्षमता अपरिमित है। भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि इस शक्ति का उपयोग जिम्मेदारी, नैतिकता, सावधानी और वैश्विक सहयोग के साथ किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि CRISPR का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे।

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Deepak Kumar Mishra

लेखक परिचय: दीपक कुमार मिश्रा (Hindi) दीपक कुमार मिश्रा एक ऐसे लेखक और विचारशील व्यक्तित्व हैं, जो विज्ञान और प्रबंधन की शिक्षा से लेकर आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक चेतना तक का संतुलन अपने लेखों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मानव व्यवहार, नेतृत्व विकास और धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझने और उन्हें समाज में प्रसारित करने में समर्पित किया है। वे The Swadesh Scoop के संस्थापक (Founder) और संपादक (Editor) हैं — एक स्वतंत्र डिजिटल मंच, जो तथ्यपरक पत्रकारिता, भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, तकनीक और समसामयिक विषयों को गहराई और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करता है। दीपक जी एक अनुभवी लाइफ कोच, बिज़नेस कंसल्टेंट और प्रेरणादायक वक्ता भी हैं, जो युवाओं, उद्यमियों और जीवन के रास्ते से भटके हुए लोगों को सही दिशा देने का कार्य कर रहे हैं। वे मानते हैं कि भारत की हज़ारों वर्षों पुरानी सनातन परंपरा न केवल आध्यात्मिक समाधान देती है, बल्कि आज की जीवनशैली में मानसिक शांति, कार्यक्षमता और संतुलन का भी मूलमंत्र है। उनका लेखन केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पाठकों को सोचने, समझने और जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है। वे विषयवस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उसमें डूब जाता है — चाहे वह विषय आध्यात्मिकता, बिज़नेस स्ट्रैटेजी, करियर मार्गदर्शन, या फिर भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी गहराइयाँ ही क्यों न हो। उनका मानना है कि भारत को जानने और समझने के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि धर्म, दर्शन और अनुभव की आंखों से देखना ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने The Swadesh Scoop की स्थापना की, जो ज्ञान, जागरूकता और भारत की वैदिक चेतना को आधुनिक युग से जोड़ने का माध्यम बन रहा है। 🌿 “धर्म, विज्ञान और चेतना के संगम से ही सच्ची प्रगति का मार्ग निकलता है” — यही उनका जीवन दर्शन है। 🔗 LinkedIn प्रोफ़ाइल: https://www.linkedin.com/in/deepak-kumar-misra/ ✍️ Author Bio: Deepak Kumar Mishra (English) Deepak Kumar Mishra is the Founder and Editor of The Swadesh Scoop, an independent digital platform focused on factual journalism, Indian knowledge systems, culture, technology, and current affairs presented with depth and clarity. He is a thoughtful writer and commentator who blends his academic background in science and management with a deep engagement in spirituality, Dharma, leadership development, and human behavior. Through his work, he seeks to promote clarity, awareness, and critical thinking over sensationalism. His writing goes beyond information and aims to inspire readers to reflect and engage deeply with ideas — whether the subject is spirituality, business strategy, career guidance, or the profound roots of Indian civilization. He believes that to truly understand India, one must look beyond history and view it through the lenses of Dharma, philosophy, and lived experience. With this vision, he founded The Swadesh Scoop to connect ancient Indian wisdom with modern perspectives through knowledge and awareness. 🌿 “True progress lies at the intersection of Dharma, science, and consciousness” — this is the guiding philosophy of his life.

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तिलक और कलावा: 5000 साल पुराना भारतीय ‘Biohacking’ जिसे समझने में विज्ञान को सदियां लग गईं

लेखक: दीपक कुमार मिश्रा संस्थापक एवं संपादक, The Swadesh Scoop भूमिका: प्रमाण की भूख और हीन भावना का जाल एक समाज के रूप में हम आज एक विचित्र दौर से गुजर रहे हैं। हम उस दौर में हैं जहाँ हम ‘Mindfulness’ के नाम पर $50 का सब्सक्रिप्शन ले लेते हैं, लेकिन अपने घर के आंगन में होने वाली संध्या आरती को ‘पुरानी सोच’ कहते हैं। अक्सर जब हम किसी को माथे पर तिलक लगाए या कलाई पर कलावा बांधे देखते हैं, तो आधुनिकता की दौड़ में हम इसे केवल एक धार्मिक रस्म मान लेते हैं, लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो Science behind Tilak and Kalawa (तिलक और कलावा के पीछे का विज्ञान) हमें चकित कर देता है। यह प्राचीन भारतीय ‘बायोहैकिंग’ का एक ऐसा रूप है जिसे हमारे ऋषियों ने मानव शरीर के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और ऊर्जा केंद्रों को संतुलित करने के लिए विकसित किया था।” मेरा स्पष्ट मानना है कि हमारा ‘हीन भावना’ (Inferiority Complex) ही वह सबसे बड़ी बाधा है जो हमें यह स्वीकार करने से रोकती है कि हमारी 5000 साल पुरानी परंपराएं कितनी तार्किक और गहरी थीं। आज का युवा हर बात पर ‘एविडेंस’ (प्रमाण) मांगता है। प्रमाण मांगना बुरा नहीं है, लेकिन समस्या तब होती है जब हमारा दृष्टिकोण ही पक्षपाती हो। हम पश्चिमी लैब की एक अधूरी रिपोर्ट पर तो नाचने लगते हैं, लेकिन हजारों वर्षों के आजमाए हुए ‘अनुभवजन्य विज्ञान’ (Empirical Science) को समझने के लिए जरूरी धैर्य और सही अप्रोच (Approach) नहीं रखते। हम यह भूल जाते हैं कि कुछ चीजों को समझने के लिए केवल माइक्रोस्कोप की नहीं, बल्कि एक स्थिर मन और सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है। आइए, आज विज्ञान के उसी चश्मे से हम तिलक और कलावा के ‘स्वदेश स्कूप’ को डिकोड करते हैं। भाग 1: तिलक का महा-विज्ञान (A Deep Dive into Neuro-Biology) माथे के बीचो-बीच तिलक लगाना कोई सौंदर्य प्रसाधन नहीं है। यह मानव शरीर के सबसे संवेदनशील ‘कंट्रोल रूम’ को सक्रिय करने की एक विधि है। इसे विस्तार से समझने के लिए हमें शरीर विज्ञान (Anatomy) की गहराइयों में उतरना होगा। 1.1 पीनियल ग्रंथि: चेतना का ‘अणु’ (The Pineal Gland & DMT) जहाँ तिलक लगाया जाता है (भ्रूमध्य), उसके ठीक पीछे मस्तिष्क के केंद्र में पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) स्थित होती है। आधुनिक विज्ञान इसे ‘Master Gland’ का एक हिस्सा मानता है, लेकिन प्राचीन ऋषियों ने इसे ‘आज्ञा चक्र’ कहा था।http://National Center for Biotechnology Information (NCBI) – Pineal Gland Functions 1.2 प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स और निर्णय लेने की क्षमता हमारा माथा (Forehead) मस्तिष्क के ‘प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स’ (Prefrontal Cortex) का घर है। यह हिस्सा निर्णय लेने, व्यक्तित्व अभिव्यक्ति और सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करता है। 1.3 ट्राइजेमिनल नर्व (Trigeminal Nerve) का जादू माथे के बीच से ‘ट्राइजेमिनल नर्व’ की एक महत्वपूर्ण शाखा (Ophthalmic Nerve) गुजरती है। 1.4 ऊष्मप्रवैगिकी और शीतलता (The Cooling Science) मस्तिष्क को शरीर का सबसे ‘गर्म’ अंग माना जाता है क्योंकि यहाँ निरंतर अरबों न्यूरॉन्स फायरिंग कर रहे होते हैं। भाग 2: कलावा (रक्षा सूत्र) – कलाई का ‘एनर्जी सर्किट’ कलाई पर बांधा जाने वाला यह धागा वास्तव में एक ‘स्मार्ट बैंड’ की तरह काम करता है, बशर्ते उसे सही तरीके से बांधा गया हो। 2.1 वेदिक सर्कुलेटरी कंट्रोल (Blood Pressure Management) आयुर्वेद के अनुसार, कलाई का हिस्सा वह जगह है जहाँ से पूरे शरीर की मुख्य धमनियाँ (Arteries) गुजरती हैं। 2.2 वात, पित्त और कफ का संतुलन कलाई पर धागा बांधने की क्रिया को ‘मणिबंध’ कहा जाता है। यह शरीर के ऊर्जा प्रवाह को ‘सील’ करने जैसा है। भाग 3: एविडेंस की जिद बनाम सही अप्रोच अक्सर लोग तर्क देते हैं, “अगर यह इतना ही वैज्ञानिक है, तो हमारे डॉक्टर इसे क्यों नहीं लिखते?” यहाँ मैं अपने पाठकों को एक कड़वा सच बताना चाहता हूँ। आधुनिक विज्ञान ‘उपचार’ (Cure) पर केंद्रित है, जबकि सनातन परंपराएं ‘निवारण’ (Prevention) और ‘अनुकूलन’ (Optimization) पर आधारित हैं। डॉ. दीपक चोपड़ा ने अपनी पुस्तक “Ageless Body, Timeless Mind” में लिखा है कि विश्वास और अनुष्ठान (Rituals) हमारे जीन एक्सप्रेशन (Epigenetics) को बदल सकते हैं। तिलक और कलावा इसी ‘एपिजेनेटिक्स’ का हिस्सा हैं। निष्कर्ष: हीन भावना का त्याग और सत्य का स्वीकार लेख के अंत में, मैं The Swadesh Scoop के पाठकों से केवल एक ही बात कहना चाहूंगा: अपनी परंपराओं को इसलिए न मानें क्योंकि मैं कह रहा हूँ, या इसलिए न मानें क्योंकि यह ‘धार्मिक’ है। इसे इसलिए मानें क्योंकि यह तार्किक है। हीन भावना से बाहर निकलें। जब आप कलाई पर कलावा बांधते हैं, तो आप पिछड़े नहीं होते, बल्कि आप उस प्राचीन चिकित्सा…

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