शिव और शक्ति का दर्शन: अद्वैत से तंत्र तक
भूमिका: यह विषय मेरे लिए क्यों महत्वपूर्ण है? मेरे अध्ययन और अनुभव के अनुसार, शिव और शक्ति का दर्शन केवल एक धार्मिक या दार्शनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह जीवन और चेतना को समझने की एक गहरी कुंजी है। जब मैंने पहली बार यह प्रश्न स्वयं से पूछा कि “सृष्टि चल कैसे रही है?” और “चेतना केवल विचार है या कोई जीवंत ऊर्जा?”—तब मुझे धीरे-धीरे यह समझ आने लगा कि इन प्रश्नों का उत्तर बाहरी संसार में नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा में छिपा है। आज के समय में, जब हर व्यक्ति बाहर की उपलब्धियों, पहचान और प्रमाणों में उलझा हुआ है, मेरा झुकाव भीतर की वास्तविकता को जानने की ओर हुआ। मेरा यह अनुभव रहा है कि जब तक हम चेतना के मूल सिद्धांत को नहीं समझते, तब तक न तो जीवन में स्थिरता आती है और न ही उद्देश्य की स्पष्टता। इसी खोज ने मुझे शिव और शक्ति के अद्वैत दर्शन तक पहुँचाया। शिव क्या हैं? मेरे अध्ययन के अनुसार मेरे अध्ययन के अनुसार, शिव किसी मूर्ति, आकृति या केवल देवता का नाम नहीं हैं। शिव चेतना हैं—निर्गुण, निराकार, साक्षी भाव में स्थित। उपनिषदों और तंत्र ग्रंथों में शिव को पुरुष कहा गया है, लेकिन यह पुरुषत्व जैविक नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य का प्रतीक है।https://iep.utm.edu/tantra/ मेरे अनुभव में, जब मन शांत होता है और विचारों का प्रवाह धीमा पड़ता है, तब जो शून्य-सा अनुभव होता है—वही शिव तत्व है। वह कुछ करता नहीं, फिर भी सब कुछ उसी से घटित होता है। शिव स्थिर हैं, लेकिन निष्क्रिय नहीं। वे आधार हैं, जिस पर संपूर्ण अनुभव टिका हुआ है। शक्ति क्या है? केवल स्त्री तत्व नहीं यदि शिव चेतना हैं, तो शक्ति उसकी अभिव्यक्ति है। मेरे अध्ययन और अनुभव के अनुसार, शक्ति ही वह तत्व है जो विचार बनती है, इच्छा बनती है, गति बनती है और अंततः सृष्टि का रूप लेती है। तंत्र दर्शन में शक्ति को केवल स्त्री नहीं, बल्कि संपूर्ण ऊर्जा-सिद्धांत माना गया है। मेरा यह अनुभव रहा है कि जब हम भावनात्मक रूप से सक्रिय होते हैं, जब प्रेरणा आती है, जब सृजन की इच्छा होती है—तब शक्ति सक्रिय होती है। शक्ति के बिना शिव केवल संभाव्यता हैं, और शिव के बिना शक्ति दिशाहीन। यही अद्वैत का मूल सूत्र है। अद्वैत का वास्तविक अर्थ: मेरे अनुभव में अद्वैत का अर्थ केवल “दो नहीं” नहीं है। मेरे अनुभव के अनुसार, अद्वैत का अर्थ है—विभाजन का अभाव। शिव और शक्ति अलग नहीं हैं, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता अलग नहीं हो सकती। https://plato.stanford.edu/entries/monism/ जब मैंने ध्यान और आत्म-अवलोकन के माध्यम से स्वयं को समझने का प्रयास किया, तब यह स्पष्ट हुआ कि मेरे भीतर भी दो स्तर हैं—एक देखने वाला (साक्षी) और एक अनुभव करने वाला (कर्ता)। तंत्र कहता है कि यही शिव और शक्ति हैं। जब इन दोनों के बीच संघर्ष होता है, तब जीवन असंतुलित होता है। और जब इनमें सामंजस्य होता है, तब शांति और स्पष्टता उत्पन्न होती है। तंत्र में शिव-शक्ति का संबंध तंत्र दर्शन मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि यह दर्शन अनुभव पर आधारित है, न कि केवल सिद्धांत पर। तंत्र कहता है कि मोक्ष जीवन से भागने में नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह जीते हुए चेतना को पहचानने में है। तंत्र में शिव बिना शक्ति के उपास्य नहीं हैं। इसलिए भैरव के साथ भैरवी, शिव के साथ काली, और सदाशिव के साथ त्रिपुरसुंदरी की उपासना की जाती है। मेरे अनुभव में, यह हमें यह सिखाता है कि केवल वैराग्य या केवल भोग—दोनों अधूरे हैं। आज के समय में शिव-शक्ति दर्शन की प्रासंगिकता मेरे अनुभव के अनुसार, आज की सबसे बड़ी समस्या आंतरिक विभाजन है। व्यक्ति सोचता कुछ है, करता कुछ है और चाहता कुछ और है। यह विभाजन मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद को जन्म देता है। आधुनिक मनुष्य का यह आंतरिक संघर्ष केवल बाहरी दबावों के कारण नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि मन (मानस), वाणी (वाचा) और कर्म (कर्मणा)—इन तीनों के बीच एक गहरी असंगति उत्पन्न हो चुकी है। भारतीय दर्शन में यह सिद्धांत अत्यंत प्राचीन और मौलिक है। मनसा वाचा कर्मणा का सूत्र हमें उपनिषदों, स्मृतियों और गीता की परंपरा में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, बृहदारण्यक उपनिषद में यह संकेत मिलता है कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बोलता है और वैसा ही बन जाता है। इसी भाव को भगवद्गीता (3.7 एवं 6.5–6) में भी प्रतिपादित किया गया है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को ही अपना मित्र और शत्रु बनाना पड़ता है।https://www.wisdomlib.org/definition/manasa-vaca-karmana मेरे अध्ययन के अनुसार, शिव-शक्ति दर्शन इसी विभाजन को समाप्त…
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