I. प्रस्तावना: ब्रह्मन की संकल्पना और उसका महत्त्व (Introduction: The Concept and Significance of Brahman)
- परिभाषा (Definition): परब्रह्म क्या है? – यह वह परम, शाश्वत, असीम, और अपरिवर्तनीय सत्ता है जो ब्रह्मांड का मूल आधार, कारण और सार है। यह केवल एक देवता नहीं, बल्कि परम सत्य (Ultimate Reality) है।
- ब्रह्मा से अंतर (Difference from Brahmā): स्पष्ट करना कि ब्रह्मन (Brahman) निराकार, निर्गुण, और परम सत्य है, जबकि ब्रह्मा (Brahmā) त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से एक, सृष्टि के रचयिता, और सगुण (व्यक्त) देवता हैं।
- लेख की रूपरेखा: लेख में ब्रह्मन की परिभाषा, विभिन्न शास्त्रों में उसका वर्णन, ज्ञान प्राप्त करने के तरीके (ब्रह्मज्ञान), और आधुनिक जीवन में इसके महत्त्व पर चर्चा की जाएगी।
II. शास्त्रों में ब्रह्मन का स्वरूप और संदर्भ (The Nature of Brahman in Scriptures & References)
यह खंड विभिन्न प्राचीन ग्रंथों से परब्रह्म की परिभाषाओं, उद्धरणों और उनके अकादमिक संदर्भों को प्रस्तुत करेगा।
A. वेदों में परब्रह्म (Brahman in the Vedas)
- मुख्य विषय: वेदों में परब्रह्मकी संकल्पना प्रकृति और यज्ञ से जुड़ी हुई थी, लेकिन इसका मूल विचार एक सर्वव्यापी शक्ति के रूप में मौजूद था।
- संदर्भ: ऋग्वेद, नासदीय सूक्त (Nāsadīya Sūkta), मंडल 10, सूक्त 129 (RV 10.129)। यह सूक्त स्पष्ट रूप से बताता है कि सृष्टि से पहले न सत् था न असत्, केवल ‘एक’ (That One) था, जिसे बाद में ब्रह्मन माना गया।
B. उपनिषदों में परब्रह्म और महावाक्य (Brahman in the Upanishads & Mahavakyas) – विस्तृत ज्ञान
उपनिषद ब्रह्मन की सबसे गहरी और विस्तृत व्याख्या करते हैं। यह लेख का मुख्य आधार है।https://www.google.com/search?q=https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/the-principal-upanishads
| महावाक्य (Mahavakya) | उपनिषद (Upanishad) | संदर्भ (Reference) | लोकप्रिय टीकाएँ (Popular Commentaries) |
| प्रज्ञानम् ब्रह्म (चेतना ही ब्रह्मन है) | ऐतरेय उपनिषद | खंड 3, अध्याय 1, श्लोक 3 (Aitareya Up. 3.1.3) | शंकराचार्य भाष्य: प्रज्ञान (चेतना) को ही ब्रह्मांड के निर्माण का मूल कारण मानते हैं। |
| अयम् आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्मन है) | माण्डूक्य उपनिषद | श्लोक 2 (Mandukya Up. 2) | गौडपाद कारिका (Gaudapada Karika): अद्वैत वेदांत की नींव रखते हुए, आत्मा और परब्रह्म की एकता को तार्किक रूप से सिद्ध करती है। |
| तत् त्वम् असि (वह तुम हो) | छांदोग्य उपनिषद | अध्याय 6, खंड 8, श्लोक 7 (Chandogya Up. 6.8.7) https://www.google.com/search?q=https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/chandogya-upanishad | रामानुज भाष्य (विशिष्टाद्वैत): इसका अर्थ “तुम उसके (परब्रह्म के) शरीर में हो” के रूप में व्याख्यायित करते हैं, न कि पूर्ण अभेद के रूप में। |
| अहम् ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्मन हूँ) | बृहदारण्यक उपनिषद | अध्याय 1, ब्राह्मण 4, श्लोक 10 (Brihadaranyaka Up. 1.4.10) | सुरेश्वराचार्य (Sureśvara’s Vārttika): शंकराचार्य के मत को विस्तृत करते हुए, यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान प्राप्त होने पर ही यह अनुभव होता है, यह केवल शब्द नहीं है। |
| सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (ब्रह्मन सत्य, ज्ञान और अनंत है) | तैत्तिरीय उपनिषद | ब्रह्मानंद वल्ली, अध्याय 1 (Taittiriya Up. 2.1) | आनंदगिरि टीका: परब्रह्म को देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे परिभाषित करती है। |
| नेति नेति का सिद्धांत | बृहदारण्यक उपनिषद | अध्याय 4, ब्राह्मण 4, श्लोक 22 (Brihadaranyaka Up. 4.4.22)https://www.google.com/search?q=https://www.sacred-texts.com/hin/sbe15/sbe15089.htm | परब्रह्म को जानने का तरीका केवल निषेध (negation) द्वारा। |
C. पुराणों और भगवद गीता में ब्रह्मन (Brahman in Puranas and the Bhagavad Gita)

- पुराण (Puranas): पुराणों में, निर्गुण (निराकार) ब्रह्मन सगुण (व्यक्त) रूप में प्रकट होता है (जैसे विष्णु, शिव, देवी)। यह निराकार को साकार रूप में पूजा के लिए प्रस्तुत करता है।
- भगवद गीता (Bhagavad Gita) – अध्याय 13-18 का महत्त्व:
- श्लोक संदर्भ:
- “मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।” (गीता 14.3) – महद् ब्रह्म (महान ब्रह्मन) मेरी योनि (जन्म स्रोत) है, और मैं उसमें गर्भ स्थापित करता हूँ।
- कर्म योग: “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥” (अध्याय 3, श्लोक 19) – अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परम (परब्रह्म) को प्राप्त होता है।
- ज्ञान योग: “ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥” (अध्याय 13, श्लोक 12) – वह अनादि परम ब्रह्म है। टीका: आदि शंकराचार्य भाष्य इसे निर्गुण ब्रह्मन की परिभाषा मानते हैं।
- भक्ति योग: “यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।” (अध्याय 8, श्लोक 21) – जिसे प्राप्त कर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम (ब्रह्मपद) है।
- समझ: गीता ब्रह्मन को अक्षर (अपरिवर्तनीय) और क्षर (परिवर्तनीय) दोनों से परे पुरुषोत्तम (सर्वोच्च व्यक्ति) के रूप में देखती है।https://www.holy-bhagavad-gita.org/
- श्लोक संदर्भ:
III. ब्रह्मन को जानने के तरीके: ब्रह्मज्ञान (How to Know Brahman: Brahmgyan)
यह खंड विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों के अनुसार ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के मार्गों का वर्णन करेगा।
A. षड दर्शन (Six Systems of Philosophy)
षड दर्शन ब्रह्मन को जानने के अलग-अलग बौद्धिक मार्ग प्रस्तुत करते हैं: https://www.google.com/search?q=https://iep.utm.edu/six-systems-of-indian-philosophy/
| दर्शन (Darshana) | ब्रह्मन की संकल्पना (Concept of Brahman) | ज्ञान का मार्ग (Path to Knowledge) | संदर्भ (Reference) |
| न्याय | ईश्वर (सृष्टिकर्ता और परब्रह्म से भिन्न), तर्क और प्रमाण पर बल। | तर्क (Logic) और पदार्थों का यथार्थ ज्ञान। | न्याय सूत्र, अध्याय 4, आह्निक 1, सूत्र 19 |
| सांख्य | प्रकृति (Matter) और पुरुष (Consciousness), परब्रह्म को अव्यक्त पुरुष के रूप में देखा जाता है। | विवेक (Discrimination) प्रकृति और पुरुष के बीच। | सांख्य कारिका |
| योग | ईश्वर (एक विशेष पुरुष) और ध्यान पर बल। | अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, आदि)। | योग सूत्र |
| वेदांत | परब्रह्म (अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत)। | श्रवण, मनन, निदिध्यासन। | ब्रह्म सूत्र |
B. वेदांत की त्रिमूर्ति: ज्ञान योग के मार्ग
- अद्वैत वेदांत (आदि शंकराचार्य): ज्ञान योग – अज्ञान (माया) को दूर करने के लिए तर्क और आत्म-जाँच। सिद्धांत: परब्रह्म ही एकमात्र सत्य है (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या)।
- विशिष्टाद्वैत (रामानुजाचार्य): भक्ति योग (प्रेमपूर्ण भक्ति) और प्रपत्ति (शरणागति) के माध्यम से।
- द्वैत (माधवाचार्य): विशुद्ध भक्ति (अनन्त भिन्नता को स्वीकार करते हुए)।
IV. मार्गों में भिन्नता क्यों? (Why the Different Paths to Attain ParBrahma?)
- अधिकार भेद (Difference in Qualification): अलग-अलग मार्गों की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि मनुष्यों का स्वभाव, बुद्धि, और संस्कार अलग-अलग होते हैं।
- शाब्दिक बनाम अनुभवात्मक सत्य (Literal vs. Experiential Truth): उपनिषद और दर्शन सत्य को परिभाषित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन अनुभव (Experience) की प्रकृति को शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता है।
- गीता का समन्वय: भगवद गीता इन सभी मार्गों को समान रूप से महत्त्वपूर्ण बताती है और एक समन्वय (Synthesis) का प्रस्ताव करती है।
V. आधुनिक जगत में ब्रह्मज्ञान (Brahman Knowledge in the Modern World)
- आधुनिक जीवन से प्रासंगिकता: तनाव प्रबंधन (अहंकार को कम करना), नैतिकता और मूल्य, कार्यस्थल पर कर्म योग (निष्काम कर्म)।
- कौन सा मार्ग बेहतर? (Which Path is Better?): कर्म, भक्ति और ज्ञान का संयोजन (Synthesis)। आज के जीवन में, निष्काम कर्म (Karma Yoga) सबसे सुलभ और व्यावहारिक मार्ग है।
VI. व्यक्तिगत अनुभव और चुनौतियाँ (Personal Experience and Challenges)
- ब्रह्मज्ञान को समझने की चुनौती (Challenge in Understanding): अवधारणा की अमूर्तता, माया का प्रभाव।
- व्यक्तिगत अनुभव (Personal Experience): ध्यान, निःस्वार्थ सेवा, शास्त्रों का अध्ययन, और एकता की भावना (Sense of Unity) की झलक मिलना।
- आधुनिक बाधाएँ: डिजिटल विकर्षण, समय की कमी, और क्षणभंगुर सुखों के प्रति आसक्ति।
VI.मेरा अनुभव: आधुनिक जीवन में भगवद गीता के योग मार्ग
(अ) व्यक्तिगत अनुभव: वर्तमान युग में भगवद गीता का समन्वय
मेरे अनुभव में, आधुनिक जगत की तीव्र गति (fast pace), डिजिटल विकर्षण (digital distractions), और जटिलताओं को देखते हुए, भगवद गीता परम सत्य (परब्रह्म) की ओर बढ़ने के लिए सबसे संतुलित और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करती है। यह किसी एक मार्ग पर ज़ोर देने के बजाय ज्ञान, कर्म और भक्ति के त्रिवेणी योग का समन्वय करती है, जो आज के समय की विभिन्न मनोवृत्तियों (temperaments) के लिए आवश्यक है।
1. कर्म योग (Karma Yoga): वर्तमान समय का सबसे सुलभ मार्ग
भगवद गीता का कर्म योग वर्तमान युग के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक और सुलभ मार्ग है, क्योंकि हम सभी को किसी न किसी रूप में कर्म करना ही होता है।
- मार्ग: फल की आसक्ति छोड़कर, अपने नियत कर्तव्यों (Duties) को समर्पण भाव से करना।
- संदर्भ:“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (गीता 2.47) अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं।
- आधुनिक प्रासंगिकता और मेरा अनुभव:
- आज के तनावग्रस्त कॉर्पोरेट या प्रतिस्पर्धी जीवन में, यह श्लोक एक मानसिक औषधि की तरह काम करता है।
- मैंने अनुभव किया है कि जब मैं किसी प्रोजेक्ट या सेवा को केवल कर्तव्य मानकर, परिणाम (फल, प्रशंसा या आलोचना) की चिंता किए बिना करता हूँ, तो मानसिक शांति और कार्यकुशलता (Efficiency) दोनों बढ़ती हैं।
- यह अभ्यास अहंकार (Ego) को क्षीण करता है और चित्त को शुद्ध करता है, जो ब्रह्मज्ञान की पहली सीढ़ी है।
2. भक्ति योग (Bhakti Yoga): भावनात्मक संतुलन का आधार
आधुनिक जीवन में जहाँ संबंध (relationships) और भावनात्मक अस्थिरता (emotional instability) एक बड़ी चुनौती है, वहाँ भक्ति योग हमारे भावनात्मक पक्ष को स्थिरता प्रदान करता है।
- मार्ग: परम सत्य (परब्रह्म/ईश्वर) के प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण।
- संदर्भ:“मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।” (गीता 18.65) अर्थ: मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर।
- आधुनिक प्रासंगिकता और मेरा अनुभव:
- मैंने अनुभव किया है कि जब मन असुरक्षित (insecure) महसूस करता है या व्यक्तिगत असफलताओं से दुखी होता है, तब यह मार्ग सबसे अधिक सांत्वना प्रदान करता है।
- आधुनिक चुनौती: डिजिटल दुनिया में, भक्ति योग हमें बाहरी आकर्षणों के बजाय एक ही केंद्र (ईश्वर) पर ध्यान केंद्रित करना सिखाता है, जिससे जीवन में भटकाव कम होता है।
- यह समर्पण का भाव अहंकार को गलाता है, जो ज्ञान योग के लिए भी आवश्यक है।
3. ज्ञान योग (Gyana Yoga): बौद्धिक स्पष्टता और विवेक
भागदौड़ भरे जीवन में रुककर विचार करने की क्षमता ही ज्ञान योग है। यह मार्ग उन लोगों के लिए है जिनका झुकाव तर्क और आत्म-विश्लेषण (Self-analysis) की ओर अधिक है।
- मार्ग: शास्त्रों के अध्ययन, गुरु उपदेश और आत्म-विश्लेषण के माध्यम से आत्मा (स्व) और अनात्मा (गैर-स्व) के बीच भेद करना।
- संदर्भ:“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” (गीता 4.38) अर्थ: निःसंदेह इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ भी नहीं है।
- आधुनिक प्रासंगिकता और मेरा अनुभव:
- मैंने पाया है कि ज्ञान योग झूठी पहचानों (False Identities) से मुक्ति दिलाता है।
- उदाहरण के लिए, जब मैं अपनी नौकरी, पद या संपत्ति को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगता हूँ, तब उपनिषदों के महावाक्य (तत् त्वम् असि) और गीता का यह ज्ञान कि “तुम शरीर नहीं, आत्मा हो” इस भ्रम को तोड़ता है।
- विवेक (Discrimination) की यह क्षमता हमें वर्तमान के झूठे सुखों से अनासक्त (unattached) होने में मदद करती है।
निष्कर्ष: मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग (कर्म-भक्ति का समन्वय)
मेरे व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, वर्तमान की अत्यधिक व्यस्तता और बौद्धिक उलझनों में, केवल ज्ञान योग का पालन करना बहुत कठिन है। इसलिए, भगवद गीता का समन्वित दृष्टिकोण ही सबसे उत्तम है:
- कर्म योग को आधार बनाना: सभी कार्य पूरी मेहनत से, लेकिन फल की चिंता छोड़ कर करना।
- भक्ति योग को भाव बनाना: हर कर्म को परम सत्य को समर्पित करना (यानी फल की आसक्ति को ईश्वर/ब्रह्मन को समर्पित करना)।
- ज्ञान योग को प्रकाश बनाना: यह सुनिश्चित करना कि यह कर्म और भक्ति किसी अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि विवेक और आत्मज्ञान पर आधारित हों।
यही पूर्ण योग है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था, और जो आज भी अराजकता के बीच शांति का सबसे सीधा मार्ग है।
- सार: परब्रह्म सनातन धर्म की आधारशिला है।
- अंतिम संदेश: चाहे मार्ग कोई भी हो, अंतिम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) और परब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करना है।
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